Total Pageviews

Showing posts with label निर्मल गुप्त व्यंग्य. Show all posts
Showing posts with label निर्मल गुप्त व्यंग्य. Show all posts

Tuesday, January 10, 2012

ए सुबह ,तेरा इरादा क्या है !

कुहासे में लिपटी सुबह से मैं और मेरा शहर आजकल जब यह पूछते हैं कि कहो कैसी हो तो उसका जवाब होता है ,ठीक तुम्हारी तरह हूँ ,एक टुकड़ा धूप के लिए बेचैन |उसका यह उत्तर सुनकर शहर मायूस हो जाता है और कुछ देर यहाँ -वहाँ जल रहे अलावों पर हाथ सेंकने के बाद अपने रोज़मर्रा के काम पर बढ़ लेता है |उसके पास मौसम के सर्द मिजाज़ से सीधे आँख मिलाने का न तो फुरसत है और न आवश्यक साहस |दो जून रोटी के जुगाड़ की अनसुलझी गुत्थी को अपने काँधे पर लादे यह शहर अनमना-सा ही सही चलता रहता है ,अपनी महत्वकांक्षाओं और अश्लील सपनों को निरंतर स्थगित करता हुआ |
मौसम बदलते रहते हैं और उसी के साथ सुबह के मिजाज़ के रंग और रूप भी |अभी तक इस शहर में कोई ऐसी रात नहीं आई ,जिसकी सुबह न हुई हो | मैंने इस शहर की सुबह को अनेक रंग रूप में देखा और जिया है |ऐसे भी मौके आये जब मैंने किसी मनहूस रक्तरंजित रात के बाद सुबह को अत्यंत विचलित होने के बावजूद मातमपुर्सी के लिए इस आशावाद के साथ के तत्पर खड़ा देखा है कि जो हुआ सो हुआ ,पर अब ऐसा कभी नहीं होगा |यह अलग बात है कि यह आशावाद हमेशा अल्पायु ही रहा है |इस शहर के बाशिंदों को चाहे –अनचाहे यही दोहराना पड़ता है –सुबह होती है शाम होती है
उम्र यूंही तमाम होती है |
हालात चाहे जो हों ,इस शहर में बिना गहरे आशावाद के जिंदा रह पाना मुश्किल ही नहीं ,नामुमकिन है (डान फिल्म के एक प्रसिद्ध संवाद से साभार )|एक बार निराशा और हताशा का जिसने दामन थामा तो उसे अंततः किसी पागलखाने की चारदीवारी में शरण मिल पाई या आत्महत्या के किसी उपकरण के जरिये ही मुक्ति नसीब हुई| अलबत्ता बेशर्म लोगों के लिए इस शहर में कभी कोई खतरा नहीं रहा |मेरा कहना यह है कि इस शहर के चरित्र की पुख्ता निशानदेही इस शेर से ही संभव है |भविष्य में कभी अपने शहर के गुणगान की ज़रूरत पेश आये तो इस अशआर को बीजमंत्र मानकर थोड़ी हेरफेर के साथ उपयुक्त गीत रचा जा सकता है |हाल ही में हुई एक ऐसी प्रतियोगिता में जो गीत चुने गए उनमें तमाम मेधावी गीतकार रेवड़ी गज्ज्क आदि की मिठास की शान में कसीदे काढ़ते दिखाई दिए |उनके लिखे गीतों से तो यही लगा मानों मेरा पूरा शहर या तो हलवाई का कोई विशालकाय शोरूम हो या औघड़नाथ नामक वह मंदिर जिसके साथ प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की चंद झूठी –सच्ची यादें बावस्ता हैं |इन गीतों से यही प्रतिध्वनित होता है कि लगभग डेढ़ सौ साल पहले हमारे पूर्वजों ने संग्राम के बाद एक बार जो हथियार रखे ,इसके बाद यह शहर भविष्य की प्रत्येक संभावना को नकार कर मिठाई बनाने ,बनवाने ,खिलाने और खिलवाने में ही लगा रहा |
मौसम की थोड़ी –सी तल्ख़ मिज़ाजी हमें परेशान कर देती है क्योंकि उससे हमारा रिश्ता आज भी मालिक और दास का है |मौसम हमारे लिए एक क्रूर राजा है और हम उसकी भय से कंपकपाती रिआया |गरीबी में घिरी अधिसंख्य जनता के पास न तो इस बेमुर्रव्व्त जाड़े से निजात पाने को वस्त्र हैं ,न सर छुपाने को उचित छत ,न मौसमनुकूल भोजन और न हाथ तापने और शरीर को गर्म रखने के लिए अलाव जलाने के साधन |कुछ लोगों के लिए यह सर्दी बतकही के लिए अवकाश ले कर अवश्य उपस्थित होता है |शहर का एक तबका ऐसा भी है जो रात के अँधेरे में कुछ फटे पुराने गर्म कपड़े और कम्बल लेकर सुपात्र भिखारियों की खोज में निकलता है और अगले दिन सभी को अपने मिथकीय दानवीर कर्ण होने की गाथा इस टिप्पणी के साथ बताया करते हैं कि इस शहर में अब कोई ऐसा गरीब नहीं है ,जिसके पास ओढ़ने को गर्म कम्बल और पहनने को गर्म कपड़े न हों |
मेरे शहर में सुबह तीन तरह के सन्देश ले कर उपस्थित हुआ करती है |कुछ के लिए रेनी- डे की तर्ज़ पर मुहमांगी मुराद सरीखी स्कूलों के अवकाश की खुशखबरी के साथ |कुछ के लिए रूमहीटर के पास बैठ कर हाथ तापते हुए ठण्ड से मरे लोगों की संख्या को लेकर बहस का सामान लेकर और अधिकांश के लिए एक और दिन जिंदा बचे रहने का सुकून लेकर |
मैंने तय किया है कि यदि हालात न सुधरे तो मेरा शहर पूछे या न पूछे पर मैं कल कुहासे में लिपटी सुबह से यह ज़रूर पूछूँगा –ए सुबह ,और बता तेरा इरादा क्या है ?मेरे लिए यह सवाल पूछना इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि मुझे दूसरों के सपनों को ईंधन बनाकर अपने लिए अलाव जलाने की कला फ़िलहाल तो नहीं आती |

Wednesday, September 21, 2011

टोपी में सदभावना

टोपी भर सदभावना
.........................
एक समय की बात है .एक राजा को सदभावना एकत्र करने की आवश्यकता अनुभव हुई .उसने मुनादी करा दी कि प्रजा आये और यथाशक्ति सदभावना उसे दे .सारे राज्य में सदभावना न्योछावर करने के उत्सुक लोगों में होड़ लग गई .लोग झोला भर भर कर सदभावना लेकर आने लगे .राजा एक मंच पर आसीन थे .लोग आते अपनी शाब्दिक सदभावना के गीत गाते और राजा के चरणों में शीश नवाते और आगे बढ़ जाते .कुछ लोग ऐसे भी थे जो अपनी सदभावना को बड़ी एहतियात सेएक से बढ़ कर अलंकृत टोपियों में संभाल कर लाए थे .वे भी मंच पर गए राजा को टोपी पहनाई और अपनी सदभावना से राजा की बेशकीमती पोषाक ,उसका तन और मन सबको सराबोर कर दिया.
राजा टोपियां पहनता रहा ,आनंदित होता रहा .अंत में एक गरीब जुलाहे की जब बारी आयी तो उसने झिझकते हुए अपने हाथों से बड़े प्यार से बुनी टोपी को राजा के सिर पर पहनाने की अनुमति मांगी .राजा ने उसकी एकदम साधारण टोपी को देखा तो उसे पहनने से इंकार कर दिया.
राजा ने कहा -ए जुलाहे मैं तेरी ये टोपी नहीं पहन सकता .तूने तो इसे लाने में बड़ा विलम्ब कर दिया.
जुलाहे ने राजा से कातर स्वर में फिर अनुनय की -महराज मेरी टोपी को अपने सिर पर सजने का मौका दें .
राजा जुलाहे की उस बाल हठ पर हंस पड़ा ,बोला -अरे मूर्ख ,सबने इतनी सदभावना मुझ पर उड़ेली है कि केवल मैं ही नहीं ,मेरा मुकुट ,मेरा सिंहासन सब तरबतर हैं ..अब तेरी टोपी वाली सदभावना तो मेरी आत्मा को ही भिगो देगी ,जिसे मैंने अब तक बड़े जतन से भीगने से बचा रखा है .
-ए जुलाहे ,तू ही बता अपनी भीगी हुई आत्मा को लेकर मैं कैसे करूँगा राज .मुझे तो अभी चक्रवर्ती सम्राट भी बनना है.जा ले जा अपनी टोपी अपने साथ.
राजा की ये बात सुनकर जब जुलाहा मंच से नीचे आया तो उसकी उस टोपी में रखी सदभावना से गर्म भाप उड़ रही थी .

Monday, September 5, 2011

यह है खुला खेल .....

आजकल इंग्लैण्ड में हमारी क्रिकेट टीम की दुर्गति हो रही है |अमरीका में चल रहे यू एस ओपिन में एक एक करके दिग्गज धाराशाही हो रहे हैं |पर हमारे देश में राजनेताओं और नौकरशाहों की तो बल्ले -बल्ले है|वे तो धनार्जन के क्षेत्र में निरंतर नए कीर्तिमान स्थापित करने की ओर अग्रसर है|इस समय हमारे राजनीतिक परिदृश्य पर खेला जा रहा है -खुला खेल फरुखाबादी|जिसे देखो वही अपनी संपत्ति का विवरण सार्वजानिक करने की जल्दी में है|बहुत दिनों के बाद अवसर हाथ आया है कि अपनी धन सम्पदा की सार्वजनिक नुमाइश कर सकें|मन में जाने कब से यह तड़प थी कि काश मौका मिले तो जनता जनार्दन को बताएं कि वे क्यों विशिष्ट हैं और वे किस प्रकार जन साधारण या आम आदमी|वास्तव में यह वक्त की मांग और ज़रूरत भी है कि आम आदमी को सप्रमाण उसकी औकात बता दी जाये|बात -बात पर राजनेताओं के खिलाफ झंडा बुलंद करने को आतुर आम आदमी को आइना दिखाया जाना ज़रूरी था|
राजनेताओं और टाप नौकरशाहों द्वारा सम्पत्ति के सार्वजनिक प्रदर्शन से उनकी नेकनीयती ,ईमानदारी और सदाशयता का प्रमाण तो मिला ही है,इससे यह भी पता चला है उनका दामन कितना पाक साफ़ है|इससे इस रहस्य पर से भी पर्दा उठ गया है कि राजनेताओं के वस्त्र क्यों इतने धवल और नौकरशाहों के कालर कैसे इतने सफ़ेद दिखा करते हैं|अब कोई साबुन निर्माता यदि यह दावा करेगा कि सफेदी की चमक पर उसका एकाधिकार है तो तत्काल झूठा सिद्ध हो जायेगा|
आम आदमी अपनी अखबार पढ़ने की लत के चलते विवश होकर जब सुबह उसे पढ़ता है तो कुछ ही मिनट बाद गहरी हताशा में डूब जाता है|किसी के पास करोड़ों का सरमाया है तो किसी के पास अरबों रुपयों का|सभी के पास दो -चार रिहाईशी मकान ,कुछ फ्लैट्स,मोटा बैंक बैलेंस ,एफडी ,सोने के ढेरों आभूषण आदि -आदि हैं|तब आम आदमी सोचता है कि हम सिर छुपाने के लिए एक छोटे से घर का सपना पूरा करने में वर्तमान के साथ पूरा भविष्य गिरवी रख देते हैं ,तब भी उसके सपने का साकार होना संदिग्ध ही रहता है|वह कभी किसी बिल्डर द्वारा ठग लिया जाता है तो कभी किसी बिचोलिये की कुटिलता का शिकार बन जाता है और कभी किसी विकास प्राधिकरण के गडबडझाले का शिकार बन जाता है |बैंक बैलेंस में मोटी धनराशि का तो उसने सपना तक देखना कब का छोड़ दिया है|दो वक्त की रोटी के लिए राशन,खास मौकों पर पहनने योग्य कपड़ों की व्यवस्था ,बच्चों को समुचित शिक्षा दिलवाने की जद्दोजेहद,बेटी के हाथ पीले करने के लिए दहेज़ की फ़िक्र के बीच वह तमाम कठिनाइयों में जिंदा रह पाता है ,इसे ही वह ईश्वर की अनुकम्पा मानता है|
सारे लोकसेवक जिस विनम्रता और अदा के साथ अपनी संपत्ति का ब्यौरा दे रहे हैं,उसमें से आती एक चुनौती की पदचाप को साफ़ सुना जा सकता है|आम आदमी के लिए इसमें एक हिकारत भरी चेतावनी है|अपनी हदों में रहने का कठोर सन्देश है|जाँच एजेंसियों को दिखाया जाने वाला ठेंगा है|पद और सत्ता का अहंकार भी है इसमें|अपनी सम्पदा के इस भव्य प्रदर्शन पर परम संतोष ,गर्व और तुष्टि का भाव भी|देखने दिखाने के इस खेल के जरिये देश की जनता के लिए सुस्पष्ट सन्देश यह है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के मध्य भी परिवर्तित पदनाम के साथ राजे, रजवाड़ों और सामंतों की स्वायत्त सत्ता बरक़रार रहती हैइसीलिए |जाँच एजंसियों के तथाकथित लंबे हाथ भी इनके गिरेबान तक पहुँचने से पहले ही सलाम की मुद्रा में आ जाते है|

Thursday, August 18, 2011

सरकार -अन्ना का पन्द्रहदिनी टेस्ट मैच शुरू


इस मामले में मुझे कोई भ्रम नहीं है कि मैं अन्ना हजारे हूँ .मेरे पास अपने अन्ना होने का ऐलान करती न तो कोई टोपी या टीशर्ट या फिर अंगवस्त्र ही है.मेरे पास अपने माँ -बाप का दिया एक अदद साफ सुथरा शुद्ध स्वच्छ पारदर्शी नाम है ,जिसके जरिये लोग मुझे जानते और पहचानते हैं.उम्र के इस पड़ाव पर इस नाम को यदि बदलना भी चाहूं तो यह एक दुष्कर काम होगा.इसी नाम के साथ जीना और सभवतः मरना भी मेरी नियति है.शेक्सपियर ने पता नहीं क्या सोच कर कहा होगा कि नाम में क्या धरा है ,पर अनुभव बताता है कि आदमी के भूत भविष्य और वर्तमान में नाम की उपस्थिति अपरिहार्य रूप से रहती है.वह जब तक जीता है ,तब तक नाम उसके साथ चाहे -अनचाहे चिपका रहता है और मरने के बाद भी नाम जीते जी किये गए कृत्यों -दुष्कृत्यों के जरिये अपनी उपस्थिति को गाहे बगाहे दर्ज कराता रहता है.
सत्ता के गलियारों में पिछले तीन माह से अन्ना हजारे के नाम की आंधी चल रही है ,जिसकी धमक मेरा शहर भी पूरे देश के साथ महसूस कर रहा है .उनकी राष्ट्रीय पटल पर मौजूदगी यह अहसास जगाने में कामयाब है कि पड़ौसी घरों में बलिदानी संघर्षशील जुझारू लोगों ने जन्म लेना अभी बंद नहीं किया है.तमाशबीन मानसिकता खुद खेल से बाहर रह कर केवल ताली बजाने में ही आनंदित होती है.दूसरे के घर जन्मा भगत सिंह हमें गौरान्वित करता है और दैवयोग से अपने घर में यदि ऐसा कुछ हो जाये तो लगता है मानो अनर्थ हो गया हो.इसीलिए ही यह नारा गली -गली गूँज रहा है -अन्ना तुम संघर्ष करो ,हम तुम्हारे साथ है.अन्ना तुम अनशन करो ,जब तक संभव हो भूखे रहो,अपनी जान गवां सकते हो तो गँवा दो ,हम भरपेट अघाये हुए लोग तुम्हारे साथ हैं.जब तक तुम जियोगे जयकार करेंगे .यदि मरखप गए तब तुम्हारी समाधि पर फूल बरसाएंगे.इस काम में हमने न कभी कोई कोताही की है ,न कभी करेंगे.यही वह काम है ,जिसे हम बखूबी जानते हैं.सदियों को अभ्यास है हमें इस काम का.
अन्ना आमरण अनशन पर हैं .दिल्ली पुलिस ने उन्हें अनशन के लिए रामलीला मैदान पन्द्रह दिन के लिए दे दिया है.दिल्ली पुलिस ने जो सदाशयता दिखाई है ,वह सराहनीय है.सरकारी सोच भी यही है कि अन्ना की पन्द्रह दिन की भूख आखिर किसी का क्या बिगाड़ लेगी?सत्ता के अहंकार में आकंठ डूबे ,मोटे भत्ते पगार और कमीशन आदि को उदरस्थ कर डकार पर डकार मारते लोगों से भूख से निढाल हो चुकाकुपोषण का शिकार एक शरीर आखिर कब तक लड़ेगा?एक बड़बोला नेता तो साफ़ -साफ़ कह चुका है -अन्ना भले आदमी हैं पर आत्महत्या पर क्यों उतारू हैं.
अन्ना देश से भ्रष्टाचार के समूल नाश के लिए अभियान चलाये हैं और हमारा हर छोटा -बड़ा नेता उस जादुई छड़ी को ढूँढ रहा है,जिससे सांप भी मर जाये पर लाठी न टूटे.जिसके माध्यम से कुछ ऐसा हो सके कि भ्रष्टाचार भी निर्बाध गति से चलता रहे ,पर तमाम चिंतातुर आँखों के आगे ऐसी धुंध छा जाये कि वह देखने पर भी दिखाई न दे.लेकिन लाल किले के प्राचीर से जो अंतिम खबर आयी थी उसका सार यही था कि बहुत तलाशने पर भी वह जादुई छड़ी मिल नहीं पाई है.तलाश पूरे जोर शोर से जारी है.
फ़िलहाल सारी जाँच एजेंसियां आतंकवादियों की धरपकड जैसे दीगर काम छोड़ कर हर घर ,दफ्तर, गली ,कूंचे, नदी ,नाले, पोखर, तालाब, बाज़ार हाट ,बाग, बागीचे, झोपड़पट्टी, लोगों की जेबों, बच्चों के बस्तों, मंदिरों की गुल्लकों ,भिखारियों के भिक्षा पात्रों में जादुई छड़ी को ढूँढने के सर्वोच्च राष्ट्रीय महत्व के काम में लगी हैं.उनके समक्ष इस काम के साथ ये गुरुतर दायित्व भी है कि वे चौबीसों घंटे अन्ना पर इस बात के लिए निगाह रखें कि कोई अदृश्य विदेशी ताकत उन्हें चुपके से कुछ खिलाने न पाए.अब सरकार के पास दो विकल्प हैं या तो अन्ना का आमरण अनशन अपनी नियत अवधि के भीतर अपनी अंतिन परिणिति तक पहुँच जाये या फिर भ्रष्टाचार को धुंध से ढँक देने वाली जादुई छड़ी मिल जाये.
मैंने पहले ही कहा कि मैं अन्ना हजारे नहीं हूँ.मेरे नाम के साथ जुड़ा कोई आभामंडल या प्रभाव नहीं है.इस नाम के साथ कोई खतरा मौजूद नहीं है और तमाशबीन बने रहने की पूरी सुविधा भी है.सरकार और अन्ना के बीच पन्द्रहदिनी टेस्ट मैच जारी है.अपने नाम को बिना बदले या धारण किये इसे पूरे मनोयोग से देखते रहें.


Wednesday, August 10, 2011

हमारे पास इब्नबतूता है

तीन दशक पहले सलीम जावेद के लिखे इस एक संवाद ने कि मेरे पास माँ है ,सिनेमाघरों में खूब तालियाँ पिटवाई थी ,तब मेरी कम उम्र अक्ल में इस डायलाग का मर्म कतई नहीं आया था.तब मेरे पास भी एक अदद माँ वास्तव में हुआ करती थी.बात -बात पर डांटने -फटकारने वाली माँ ,पढाई में ध्यान लगाने की ताकीद करने वाली माँ .क्षण में क्रोध में धधकती ज्वाला और पलक झपकते ही ठंडी फुहार -सी माँ .मैं ही क्या मेरे तमाम सहपाठियों और मित्रों के पास भी अपनी -अपनी माँ थीं.जिससे वे सभी डरते भी थे ,किलसते भी थे ,चिढते भी थे ,प्यार भी करते.
हम लोगों ने स्कूल से भाग कर वह पिक्चर देखी थी -दीवार.जिसमें अमिताभ बच्चन ने अपने पुलिस अफसर भाई से कहा था -तुम्हारे पास क्या है .मेरे पास गाड़ी है ,बंगला है ,बैंक बैलेंस है .....जिसके जवाब में शशि कपूर ने कहा था -भाई मेरे पास माँ है.और इस डायलाग को सुनकर तालियों की खूब गूँज उठी थी. हम मन्दबुद्धि सोचते रहे थे कि जब एक भाई के पास माँ है तो इसमें इतना इतराने की क्या बात.
ये वो समय था जब दुनिया काफी सहज और सपाट थी.सूचनाएं काफी देर से आ पाती थीं.उम्र के लिहाज़ से जानकारियों का वितरण होता था.आज की तरह नहीं नवजात शिशु ने पालने से उतर कर अपने पावों पर चलना शुरू किया नहीं कि तुरंत ही जा पहुंचा वयस्कों की दुनिया में.हमें तो तब भी कुछ नहीं समझ आता था जब कोई अभिनेत्री बालों को बिखेरे रुंधे गले से यह कहती थी कि मैं तो अब किसी को मुह दिखाने के लायक नहीं रही.तब हम सोचते अच्छी खासी तो है जरा बाल संवार ले तो भला कौन इसका मुह देखना नहीं चाहेगा.
तीन दशक का समय कम नहीं होता .समय निर्बाध गति से बहता रहा.बाल बिखेरे घूमती अभिनेत्री के कथन का निहितार्थ समझ में आया.दो बेटों के बीच माँ की सत्ता का भावनात्मक गणित भी अबूझ पहेली न रहा .माँ वाला संवाद भी स्मृति से गायब या डिलिट होने की प्रक्रियाधीन था.तभी संगीतकार ए.आर रहमान सिनेमा की दुनिया में किसी धूमकेतु की तरह प्रकट हुए और जय हो -जय हो करते हुए आस्कर अवार्ड का गोल्डन ग्लोब लेने जब मंच पर पहुंचे तो उन्होंने कहा -मेरे पास माँ है.सभागार तालियों की गडगडाहट से गूँज उठा.स्वदेशीजन तो उनके कहे का मतलब समझ गए लेकिन सभागार में उपस्थित हजारों वो अनाड़ी दर्शक जिन तक यह डायलाग अनुवाद के द्वारा पहुंचा घंटों तक सर खुजाते सोचते रहे कि क्या आस्कर अवार्ड के साथ माँ भी दी जाने लगी हैं.
ए.आर रहमान के मुह से निकल कर तीस दशक पुराना संवाद जिंदा हो उठा.इस बार गुलज़ार चूक गए.इधर -उधर से पढ़े -पढाये का चरबा बनाने की कला भला उनसे बेहतर कौन जानता है.पर हमारे राजनीतिक रंगमंच पर गुलज़ार से अधिक प्रतिभाशाली जुगाड़ी मौजूद हैं.उन्होंने जुमलेबाज़ी में महारत हांसिल कर रखी है.पिछले दिनों जब सत्ता के तहखानों से एक एक करके भ्रष्टाचार से लबालब भरे गया ऐसे घड़े निकलने शुरू हुए ,जिनके सामने पद्मनाभ मंदिर का सरमाया अपनी चमक खोता नज़र आने लगा .विपक्ष मुख्य भ्रष्टाचारी किरदारों और उनके आश्रयदाताओं के नाम गिनाने में संलिप्त हुआ तब .....एक आवाज़ आयी -हमारे पास मनमोहन सिंह हैं .एकदम साफ शफ्फाक चेहरा.शतप्रतिशत ईमानदार और बेदाग राजनेता.इतने बेदाग कि अनेक प्रसिद्ध साबुन निर्माताओं को अपना ताज डोलता लगे.तुम्हारे पास है क्या? आरोप ,आरोप और खालिस आरोप.
यह सुन जनता चुप नहीं रही ,तुरंत जवाब आया -हमारे पास इबन्बतूता है,जिसका जूता पहनने पर तो करता है -चुरर पर जब हाथ में आये तो छुड़ा दे बड़ों बड़ों को पसीना.





Wednesday, July 27, 2011

एक हुआ करता था सर्कस


यह ज्यादा पुरानी कहानी नहीं है .केवल दो - तीन दशक पुरानी  बात है.एक सर्कस हुआ करता था,जो घूम -घूम कर सारे मुल्क में अपने खेल दिखाया करता था .सारे में उसकी धूम थी.सर्कस मालिक की खूब मौज थी और सर्कस कलाकारों के भी दिन मस्ती में बीत रहे थे.हर कलाकार अपने -अपने खेल में पारंगत था.जोकर भी ऐसे थे जो जब रिंग में आते तो दर्शकों के पेट हँसते -हँसते फूल जाते.जोकरों का उस सर्कस में विशेष स्थान था ,उन्हें सर्कस की कामयाबी के लिए आवश्यक माना जाता था.केवल इतना ही नहीं वे जोकर मालिकों के बड़े मुह लगे थे.उनका काम अपनी हरकतों के जरिये तमाशबीनों को आनंदित करना तो था ही ,साथ ही साथ वे अपने साथी कलाकारों की मुखबरी मालिक से करते रहने का गुरुतर दायित्व भी उनके झुके हुए कन्धों पर रहता था.वे समय -असमय मालिकों के शिविर में आते -जाते रहते और हंसी -हंसी में मालिकों को सारी गोपनीय जानकारी दे आते.बदले में मालिक उन्हें कभी -कभी इनाम इकराम से नवाज़ दिया करते.
यह वह समय था जब सर्कस में अनेक जानवर भी हुआ करते थे .एक से बढ़ कर एक खूंखार जानवर -लेकिन थे वे विशुद्ध कलाकार.उनको ऐसा सधाया गया था कि रिंग में आकर वे देखने वालों को मंत्रमुग्ध कर देते थे.शेर और चीते के एक रिंग मास्टर बिजली का हंटर लिए रिंग में आता था.रिंग मास्टर के हल्के से इशारे पर जंगल का राजा किसी निरीह बच्चे की तरह वह सब करने लगता जो करने को उनका रिंग मास्टर करता.उनके करतब पर खूब तालियाँ बजतीं और रिंग मास्टर उसका सारा श्रेय खुद ले लेता .उसने शेर चीतों को हैरतअंगेज़ करतब करने तो सिखाए थे ,पर अपने किये पर होने वाली तारीफ का लुत्फ़ लेना नहीं.उन्हें मालूम था कि यदि सभी कुछ इन जंगली जानवरों को सिखा दिया तो फिर मालिकों की निगाह में उनकी कद्र ही क्या रह जायेगी.रिंगमास्टर खाली समय में से कुछ समय तो हंटर का भय दिखा -दिखा कर जानवरों को सधाता था और इससे बचे हुए समय में अवसर मिल जाने पर मालिकों को बताया करता था कि यह तो वो ही है जो इन खूंखार आदमखोरों को काबू में किये है वरना ये तो कभी भी किसी पर भी हमलावर हो सकते हैं.वह चाहता था कि मालिक उसकी अहमियत को नज़रंदाज़ ना करें.वैसे तो सर्कस में और भी कलाकार पशु पक्षी थे मसलन दो पैरों पर नाचने वाला हाथी,डिस्को की धुन पर ठुमकने वाला घोडा,पियानो बजाने वाला झबरे बाल वाला सफ़ेद कुत्ता,अपने पंजे को रंग में डुबो कर केनवास पर पेंटिंग बनाने में माहिर गधा ,छोटी सी तोप दाग कर सबको चौंका देने वाला हरियल तोता,मालिक की प्रशस्ति का हरदम गान करने वाली मैना.मैना जब गाती थी तो सर्कस के हर कलाकार के लिए  ताली पीटना अनिवार्य था .इस काम से किसी कलाकार को कोई परहेज़ भी नहीं था ,केवल रिंगमास्टर और छत पर लगे झूलों पर कूदान भरने वाले और मौत के कुँए में बाईक दौड़ाने वाले को ये काम अपनी शान के खिलाफ लगता था .
सब कुछ ठीक -ठाक चल रहा था कि तभी एक हादसा हो गया.सर्कस में जानवरों के इस्तेमाल के खिलाफ आवाज़ उठने लगी.जगह -जगह सर्कस के खिलाफ प्रदर्शन होने लगे.भीड़ ने सर्कस के पंडाल में आग लगाने की भी कोशिश की.सब डर गए कि अब क्या होगा ?जोकरों ने अनेक लतीफे सुनाकर मालिकों को हंसाने की नाकाम कोशिश की.वे समझ गए कि उनके दिन पूरे हुए और वे एक चूरन बेचने वाली कम्पनी के मुलाजिम हो गए.वे करतब दिखाते और हंसी -हंसी में अपना चूरन बेच लेते.रिंग मास्टर और झूले वाले कलाकार ने कुछ दिन जीदारी दिखाई ,मालिक को भरोसा देते रहे सब ठीक हो जायेगा.पर जब कुछ न हुआ उन्होंने तोते का पिंजरा खोल उसे उड़ा दिया ,पेंटिंग बनाने वाले गधे को उसके हाल पर खुला छोड़ दिया ,कुत्ता भी नए रोजगार की तलाश में कहीं निकल गया.रिंगमास्टर शेर चीते हाथी को जंगल में छोड़ने गया तो वापिस नहीं लौटा.
बाद में पता लगा कि झूलेवाले कलाकार ने एक क्षेत्रीय दल बना लिया है और बहती हवा के साथ वे कूदान भरता रहता है.तोप चलाने वाला तोता वीररस का कवि बनकर अपनी रटंत से विस्फोट पर विस्फोट  किया करता है.गधा खाड़ी के देश में जा बसा है और उसकी पेंटिग्स की बाज़ार में भारी मांग है.मौत के कुँए में गाड़ी दौड़ाने वाला रेलगाड़ी में चालक हो गया है .पहले वह दिल्ली में ब्लूलाइन बस चलाता था.पियानो बजाने वाले झबरीले बालों वाले  कुत्ते के घर के बाहर उसे पुरस्कार देने वालों की कतार लगी रहती है..अलबत्ता मैना अभी भी मालिकों के साथ है.
किस्सा तो काफी लंबा है ,लेकिन इतना बताना काफी है कि यदि एक बड़े नेता ने यह न कहा होता कि उनकी रजनीतिक पार्टी एक सर्कस है तो यह भूली -बिसरी कहानी कभी याद भी न आती.उसी पार्टी के एक नेता का कहना है कि हो न हो यह सर्कस का वो ही  जोकर है जो कभी मालिकों का पार्ट टाइम मुखबिर हुआ करता था.अब उसे फुलटाइम वही काम चाहिए.नहीं मिला तो मुह फुलाए बैठे हैं.                                                          

Friday, June 3, 2011

हालात सामान्य क्यों हैं


मेरे शहर में आजकल हालात एकदम सामान्य हैं.कहीं से किसी अप्रिय घटना का कोई समाचार नहीं.अफवाहों के वो कुऐं भी सूख गए हैं ,जिनके  जल से कभी सारा वातावरण तरबतर रहा करता था.वो जुलाहे जाने कहाँ चले गए जो रात दिन आशंकाओं के चरखे पर अनहोनी की कपास कातते थे.एक अतिसंवेदनशील शहर का अनायास ही यूं संवेदना शून्य हो जाना सभी को हैरत में डाले है.साम्प्रदायिकता के तराजू में तौल कर,स्थान के मिजाज के अनुरूप और  पलड़े के झुकाव के अनुसार  अपनी -अपनी कविता और शायरी की दुकान सजाये बैठे कविताफरोश अपने धंधे पर आई  मंदी  से खौफज़दा हैं.वे तो अब सरेआम कहते घूम रहे हैं कि इस शहर में कविता के सच्चे कद्रदान हैं कहाँ.कुछ शंकालु मन,सदा आशंकाओं के घटाटोप में रहने के आदी स्वछंद विचारक और आपसी कलह के तंदूर पर  अपने रोटियाँ सेंकने की कला में निष्णात खानसामे अब  यह कह कर आस लगाये हैं कि यह किसी आगत सुनामी के ठीक पूर्व का सन्नाटा है.
यह किसी आशंका की ओर इंगित करता सन्नाटा है या शहर के बदल चुके मिजाज़ की निशानदेही,कौन जाने.इस सवाल का जवाब तो केवल आने वाले समय के पास है या फिर उन भविष्यवेत्ताओं के पास जिनका दावा है कि ऊपरवाले से उन्हें भवितव्य घोषणा  की फ्रेंचाइजी प्राप्त है.अधिकांश अखबारनवीस निठल्ले हो गए हैं.उनकी अनुभवी और सधी हुई प्रशिक्षित अंगुलियां कम्प्युटर पर यह इबारत दर्ज करने के लिए कुलबुलाती रहती हैं कि शहरों में चारों ओर तनाव पसरा है.संवेदनशील इलाकों में सशस्त्र पुलिस बल की गश्त निरंतर जारी है.स्तिथि तनावपूर्ण लेकिन नियंत्रण में है.पीढ़ी दर पीढ़ी ये पक्तिंयाँ पत्रकारिता में  दंगाई हालात के बयान की मानक बन चुकी हैं.
नवोदित पत्रकारों में अलग प्रकार की बेचैनी व्याप्त है.उन्हें अपनी प्रतिभा के प्रदर्शन का पर्याप्य मौका नहीं मिल पा रहा है.घटनाविहीन हालात में  वे लिखें तो क्या लिखें.पत्रकारिता का डिप्लोमा या डिग्री लेते हुए जो कुछ उस्तादों ने सिखाया था वो भी काम नहीं आ रहा.शून्य में से समाचार क्रियेट करने का गुरुतर दायित्व उनके कंधे पर किसी वजनी उल्लू की तरह बैठ मुंह चिढाता है.
समस्त मीडियाकर्मियों के लिए वास्तव में यह कठिन समय है.अखबार का प्रकाशन प्रतिदिन होना है.उसमें ख़बरों की स्पेस को घटा पाना महामहिम प्रात:स्मरणीय  विज्ञापनदाताजी  के अतिरिक्त किसी के वश में नहीं.और यदि स्पेस उपलब्ध है तो उसे भरने के लिए ख़बरें तो चाहियें ही.बेचारे क्राईम रिपोर्टर दिन भर ख़बरों की तलाश में पुलिस थाने से लेकर पोस्टमार्टम हाउस तक और अपराधियों के सर्वज्ञात गोपनीय ठिकानों से लेकर उनके संभावित अभयारण्यों तक लगातार चक्कर काटा करते हैं.लेकिन सब व्यर्थ.कहीं कोई खबर हो तो मिले.अलबत्ता टेलिविज़न चेनलों के मेधावी रिपोर्टर तो शहर के नामचीन या कुख्यात तांत्रिकों से साठगांठ कर टी.आर .पी बढाने योग्य कुछ न कुछ गढ़ ही लेते हैं.उनकी इस क्षमता का तो पूरा शहर कायल है .पर चिंतित ये भी हैं क्योंकि वे जानते हैं कि भूत प्रेतों की कितनी काल्पनिक कथाएँ आखिर कब तक परोसेगें दर्शकों को.हालात यदि कुछ दिन और ऐसे ही  सामान्य बने रहे तब तो एक -एक बाईट के लिए तरसना ही पड़ेगा.
नीम और इमली के पेड़ के नीचे स्थापित चाय और पकोड़ों के उन दुकानों पर  , जिन्हें  शहर भर के पत्रकारों और बुद्धिजीविओं ने काफ़ी हाउस का दर्ज़ा दिया हुआ  है ,में यह चर्चा जोरशोर से चल रही है कि वो कौन से कारण हैं कि जिनके चलते शहर के  हालात सामान्य हैं.सब एक दूसरे से पूछ रहे हैं कि क्या शहर का पुलिस तंत्र  अचानक कर्मठ और अतिशय चौकन्ना हो गया है?क्या अपराध की दुनिया के तमाम मेधावी शख्सियतों के पास  कर्म करने की इच्छाशक्ति खत्म हो गई है?क्या शहर के सब लोग रातों--रात सजग,सहिष्णु,सहृदय,और जिम्मेदार नागरिक बन गए हैं.क्या वातावरण में अग्नि प्रज्वलित कर देने वाले वक्ताओं के पास मुद्दे और नुकीले और फास्फोरसयुक्त शब्दों का आकाल पड़  गया है ?क्या राजनीतिक हलकों में नाम चमकाने के लिए  साम्प्रदायिकता भडकाने का अमोघ हथियार अपनी उपादेयता खो चुका है?
इस समय शहर की फिजा में ये सवाल किसी अनिष्ट की आशंका को लिए हुए किसी गिद्ध की तरह मंडरा रहे हैं.आईये मिलजुल कर इनका मुंहतोड जवाब ढूंढे.
'''''''''''''''''''


Powered By Blogger