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Monday, August 15, 2011

इस पर भी गौर करें


जुमे का दिन था|आसमान में काले बादल छाये थे|हवा एकदम ठहरी हुई थी|उमस के मारे बुरा हाल था|आज उसने अपना ठेला मस्जिद के पास लगाया था,जिस पर छोटे बड़े तिरंगे झंडे सजे थे|पन्द्रह अगस्त का दिन पास ही था|उसे यकीन था कि आज़ादी का जश्न तो सभी मनाएंगे इसलिए अच्छी दुकानदारी होगी|वह सुबह से ठेले पर अपनी दुकान सजाये खड़ा था ,पर कोई ग्राहक न आया था|वह मायूस था|सोच रहा था कि यदि जेब खाली रही तो रोज़ा इफ्तारी का सामान लेकर वह घर कैसे जा पायेगा|
आज़ादी मिले हमें ६४ साल हुए|पर सलीके से उसका जश्न मनाना न आया|तमाम धार्मिक पर्वों पर कहीं उत्साह ,उमंग या उल्लास की कोई कमी नहीं रहती|दीपावली हो या ईद;गुरु पूरब हो या क्रिसमस या फिर होली पूरे जोश से मनाये जाते हैं|राष्ट्रीय पर्व पर हमारा उत्साह कहाँ चला जाता है|
इस सवाल का जवाब ढूढने के लिए हमें अतीत की ओर लौटना होगा|जहाँ पूरे देश के साथ मेरठ भी असमंजस की स्थिति में खड़ा है|दंगे की विभीषिका को झेलता शहर यह सोच ही नहीं पा रहा कि आज़ादी की बहुप्रतीक्षित ख्वाहिश के पूरा होने पर क्या और कैसे अपनी भावनाओं को अभिव्यक्ति दी जाये|विदेशी शासन के खिलाफ प्रथम क्रांति का उद्घोष करने वाला शहर मुल्क के सीने पर जबरन खींच दी गई विभाजन की खूनी रेखा के चलते गमजदा है |धार्मिक उन्माद चरम सीमा पर है |दोनों ओर से पलायन जारी है |मेरठ में विक्टोरिया पार्क के पास शरणार्थियों के शिविर स्थापित हैं |यह वही जगह है , जहाँ अभी कुछ माह पहले आज़ादी की लड़ाई की अगुआ रही कांग्रेस पार्टी का वार्षिक अधिवेशन हुआ था|अधिवेशन वाली इस जगह को तब प्यारे लाल शर्मा नगर का नाम दिया गया था|इस जगह को अब शर्मा नगर कहा जाता है|
कांग्रेस के इस अधिवेशन में इसके अध्यक्ष जे बी कृपलानी समेत अनेक बड़े नेता ,जिनमें महात्मा गाँधी और जवाहर लाल नेहरू आदि शामिल थे, यहाँ आये थे|१९४६में ही दंगे की दावानल की चपेट में ये शहर आ गया था|यही वज़ह थी कि इस अधिवेशन में देशभर से आये केवल १५० प्रतिनिधि ही शामिल हो पाए थे|
आज़ादी जब १४-१५अगस्त की आधी रात को दबे पाँव मुल्क में दाखिल हुई तो १५ अगस्त की वो सुबह जब पूरे देश के साथ मेरठ ने भी उन्मुक्त सांस ली| तब थोडा सुकून तो महसूस हुआ पर फिजाओं में घुली साम्प्रदायिकता की जहरीली हवा की उपस्थिति से घुटन भी अनुभव हुई |
पर इस उत्सवप्रिय शहर ने समस्त आशंकाओं को दरकिनार कर जय हिंद का अपूर्व उद्घोष किया|सड़कों पर तिरंगा लहराता जन सैलाब उमड़ा|खूब मिठाईयां खाई और खिलाई गईं|हलवाईयों ने मुफ्त में सबका मुहँ मीठा कराया|पी |एल| शर्मा स्मारक मैदान और मेरठ कालेज के परिसर में विशाल जनसभाएं हुईं,जिनमें स्थानीय नेताओं और स्वतंत्रता सेनानियों की ओजस्वी तकरीरें हुईं|इन भाषणों में आने वाले कल की सुनहरी तस्वीर और बेशुमार सपने थे|
समय बीतता रहा|सपने टूटते गए|नेताओं के सुर बदले|उनका चाल ,चेहरा और चरित्र बदला|छदम स्वतंत्रता सेनानियों की फौज अपने त्याग का मुआवजा मांगती ऊँचे ओहदों की जुगाड में लग गई|वास्तविक देशभक्त हाशिए पर सरका दिए गए|पूरा देश कुव्यवस्था के अंधकूप में डूबने लगा |भ्रष्टाचार और भाई भतीजावाद को सामाजिक स्वीकार्य मिलने लगा|आज़ादी की वर्षगांठ आती -जाती रहीं|लाल किले के प्राचीर से प्रधानमंत्री के जोशीले भाषणों को पहले रेडियो से कान लगा कर और अब दूरदर्शन के जरिये टकटकी लगाये बड़ी आस से निहारती एक पीढ़ी जवान हुई ,फिर बूढी हो चली|पर कहीं कोई बदलाव न आया|अमीर और अमीर होते गए ,गरीब का जीना मुहाल हो गया|केवल वादे और झूठे आश्वासन ही मिले|बेरोज़गारी बढ़ती गई|सरकारी योजनाओं का लाभ धरातल तक पहुँच ही नहीं पाया|
मस्जिद के पास खड़ा झंडे की दुकान लगाये वो लड़का सोच रहा है कि इस धंधे के दिन तो खत्म हुए|अब किसी को राष्ट्रीय झंडे की दरकार नहीं|कल से वह अमरुद या खजूर का ठेला लगायेगा,कुछ तो खरीदेंगे रोजेदार|यदि कुछ बिना बिके बच भी गए तो घर में रोज़ा इफ्तारी में ही काम आ जायेंगे|
लेकिन आज……….|अब वह क्या करे ?झंडे से तो रोज़ा इफ्तारी होने से रही| आज़ादी के जश्न के बाद यदि अवसर मिले तो इस मसले पर ज़रूर गौर करें|

Friday, August 5, 2011

कब जागेगा मेरा शहर

मेरा शहर एक धूल धसरित शहर है .यहाँ कानून व्यवस्था नाम की कोई चीज़ नहीं है .यहाँ की मासूम जनता अपराधियों के रहमोकरम पर जिंदा है.झपटमार यहाँ सड़कों पर निर्द्वंद घूमते हैं .महिलाओं के गले से चेन और हाथों से पर्स छीने जाने की घटनाएँ यहाँ रोज होती हैं.लुटारे दिन दहाड़े घरों में घुस कर माल ले कर चम्पत हो जाते हैं.बलात्कार आदि जघन्य कृत्य तो यहाँ होते रहते हैं.मुझे यकीन है कि बशीर बद्र ने यह शेर यहाँ के अपराधियों के होंसलों को देख कर ही कहा होगा -रात का इंतज़ार यहाँ कौन करे,दिन में यहाँ क्या नहीं होता.
सच यही है कि यहाँ दिन में सब कुछ घटित हो जाता है.रात यहाँ आराम के लिए होती है .रात को लुटी पिटी जनता अपनी रूह और शरीर पर लगे घावों को चाटती है.बिसूरते हुए लोग रहम के लिए परवरदिगार से दुआएँ मांगते हैं.डरी हुई महिलाएं अपने सुहाग ,संतति और अपनी अस्मिता के एक दिन और सुरक्षित रह जाने पर जब ईश्वर को धन्यवाद देने के लिए प्रार्थनाएं बुदबुदाती हैं तो उनके कम्पित स्वर ईश्वर की ओर कम और अपराधियों की दया भावना के प्रति अधिक समर्पित होते हैं.क्या आपको नहीं लगता कि हम सभी इसलिए जिंदा हैं क्योंकि ज़रायम पेशा लोगों की निगाह में हम निरर्थक हैं?उनकी दुनिया में हमारा वजूद एक कीड़े से अधिक नहीं है.
यहाँ अपराधी रात में कम ही सक्रिय होते हैं .वे रात में दिन भर की कमाई की जुगाली करते हैं.आगामी योजनाओं पर विचार करते हैं.राजनीति की मौखिक शतरंज पर अपनी चालों का पैनापन परखते हैं.वे भला क्यों करे रात में वारदात?अपने महफूज़ अभयारण्यों में ओवर टाइम तो केवल मूर्ख किया करते हैं.
हाल ही में एक समाचार आया कि अपराधियों के हौंसले पस्त करने के लिए एक आला पुलिस अधिकारी बिना वर्दी के एक दम साधारण आदमी की वेशभूषा में शहर की सड़कों पर कानून व्यवस्था का मुआयना करने सड़कों पर निकले.मेरी निगाह सुबह सवेरे जब इस आशय के समाचार पर पड़ी तो मेरे कानों में स्वतः ही अस्सी के दशक का यह गाना बजने लगा --जब अँधेरा होता है ......|मैं पूरी तन्मयता से समाचार पढ़ और गीत सुन रहा था और मेरे पास बैठा कुत्ता अनायास भूंकने लगा.शायद उसे भी नेपथ्य में बज़ रहे उस गाने के बोल सुनाई दे रहे थे ...जिसमें अँधेरी रात के साथ चोर -चोर की पुकार भी गूंजती है.अभी तक ऐसी कोई सूचना नहीं है कि आला आधिकारी की इस अप्रत्याशित गश्त से कुछ ऐसा चमत्कार घटा हो,जो राहत देने वाला हो.वैसे मेरी विनम्र राय है कि यदि अपनी वर्दी में पुलिसकर्मी और अधिकारी दिन के उजाले में सतर्क हो जाएँ तो अनेक अपराधी वहां पहुँच जायेंगे ,जो उनके लिए ही बनी है.यकीन मानें ये अपराधी न अतिरिक्त साहसी हैं न कुशाग्र बुद्धी हैं, न अपने हुनर में अतिशय पारंगत और न ही ओलम्पिक स्तर के धावक ,न शूमाकर जैसे प्रतिभावान वाहनचालक,निशानेबाजी में गगन नारंग या अभिनव बिंद्रा भी नहीं हैं .मुक्केबाजी में बिजेन्द्र कुमार या कुश्ती में सुशील कुमार सरीखे भी नहीं हैं.ये दुस्साहसी ज़रूर हैं.इन्हें मुगालता है कि पुलिस प्रशासन इनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता.इन्हें अपने संरक्षक राजनीतिक आकाओं पर झूठा भरोसा है कि यदि कोई आपदा आयी तो वो बचा लेंगे.
हम केवल पुलिस पर क्यों आश्रित क्यों रहें ?सब मिलजुल कर इनका प्रतिकार करें तो इनका पराजित होना तय है.पुलिस बेचारी क्या करे ,उसके कंधे पर वीआईपी ,वीवीआईपी लोगों की रखवाल ,आवभगत ,प्रोटोकाल पोषित आदर सत्कार और शिष्टाचार का गुरुतर दायित्व भी तो है.
मेरा शहर चाहे जितना धूल धसरित हो पर इसकी मिट्टी ने अभी नपुंसक कायरों को जन्म देने कारोबार शुरू नहीं किया है.यह शहर जागेगा तो इन छुट्टे घूम रहे ज़रायम पेशा लोगों और उनके सफेदपोश आकाओं पर बहुत भारी बीतेगा.
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