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Wednesday, January 23, 2013

रोजाना एक : सुबह ऐसे आती है

रोजाना एक : सुबह ऐसे आती है: मंदिर के सारे पुजारी आते   हैं नहाधोकर अपने अपने मंदिरों में जब   रात घिरी होती   है. वे   जल्दी जल्दी कराते हैं   अपने ...

Wednesday, August 29, 2012

एक पालतू मिटठू की कहानी



एक थी मादा तोता   ,हरे पखों और लाल चोंच वाली  |वह पिंजरे मे रहती थी
और उसे  अपना घर समझती  थी |उसे पेड़ की कोटर से निकाल कर इस पिंजरे तक
कौन लाया, इसका तो किसी को सही सही पता नहीं | सब उसे मिटठू के नाम से
पुकारते थे |उसका पिंजरा दिन भर घर के दरवाजे के एन ऊपर टंगा रहता और
उसमें बैठी वह मिटठू - मिटठू की रटन्त लगाये रहती |सब उसे प्यार करते,
दुलारते और खाने के कभी फल ,हरी मिर्च तो कभी पूड़ी कचौड़ी मिष्ठान देते
|
वह  मगन होकर खाती  और मस्त रहती  |उसकी जिंदगी उस पिंजरे में मज़े से
गुज़र रही थी |
तभी हुआ यह कि उस तोती  के मालिक को जाने क्या सूझी उसने  कि तोते   का
नाम मिटठू से बदल कर अभिव्यक्ति रख दिया  |तोते  का मालिक खुद को
विप्लवी  लेखक समझता था  |उसके मित्र  छपास रोगी लेखक   थे  |उन्होंने घन्टों
 
तोता विमर्श  के बाद  अभिव्यक्ति का पिंजरा  खोल दिया  |उनका मानना था कि अभिव्यक्ति
उन्मुक्त होगी  तभी तो आकाश की ऊंचाईयों को छू पायेगी |वे अपने इस
कारनामे पर इतना मुदित हुए कि उन्होंने  एक सेकंड  में एक की दर से
हजारों  हाईकू व लघुकथाएँ रच डालीं | वे  साहित्य सृजन में डूबे रहे और
अभिव्यक्ति सोचती रही कि वह पिंजरे से बाहर जाये तो जाये कहाँ |
पिंजरा खुला रहा और वह सोचती रही | उसने व्यथित होकर पुकारा मिटठू
-
मिटठू तो  मालिक ने उसे तुरन्त डपट दिया मिटठू नहीं ,अभिव्यक्ति बोल
|
अब तेरा यही नाम है |आखिरकार हार -थक कर अभिव्यक्ति अपने पिंजरे से बाहर
निकली |उसने पंख फडफडाये और आकाश में उड़ना चाहा |वह कुछ ही उड़ सकी और फिर
घर के बाहर लगे पेड़ पर जा बैठी |उसने मिटठू मिटठू की टेर  लगाई कि कोई तो
उसकी विपदा समझेगा | उसे पिंजरे में वापस पहुंचा देगा  |
पेड़ की  फुनगी पर बैठी उदास अभिव्यक्ति हमेशा  पिंजरे में वापस आने को
आतुर रहती  है |उसे पिंजरे से बाहर  खतरे  ही खतरे  दिखते हैं |कभी
बिल्ली से , कभी बाज़ से और कभी गली के शैतान बच्चों की गुलेल  से बचना
पड़ता है | भोजन  के लिए पूरी जद्दोजेहद करनी  है ,फिर भी वैसे मालपुए
कहाँ मिल पाते हैं जैसे पहले मिलते थे  बैठे ठाले  |उसने पिंजरे के बाहर
जैसे -तैसे जीना तो सीख लिया है पर उसे  कष्ट बहुत हैं |
एक दिन उसे अपना पुराना मालिक मिला तो उसने कहा -आपने मुझे अभिव्यक्ति
बना कर  मुसीबत मे डाल  दिया |मुझे वापस घर ले चलो | मालिक ने कहा
अब तुझे कौन रखेगा घर में |मैंने सुना है कि तू अब गंदी गंदी गलियां
देना सीख गयी है |सबका  मखौल उड़ाती है |अफवाहें फैलाती है | खरी खरी
कहती है |कभी बेहया ट्विटर  तो कभी किताबी चेहरे वाले खटरागियों  की
संगत में दिखती है |मैंने  सुना  है कि तू आवारा तोतों को देख कर सीटी भी
बजाती है |मैं ठहरा बाल बच्चों वाला संस्कारवान लेखक तुझे अपने घर में रख
कर  मुझे समाज में अपनी थू थू नहीं करवानी |तू जहाँ है ,वहीं रह |
अभिव्यक्ति को पिंजरे से मुक्त  हुए अरसा हुआ पर उसे अपने  सपनों में
पिंजरा अभी भी दिख जाता  है |उसने पिंजरे वापस पाने किस -किस से गुहार
नहीं की पर  किसी ने न सुनी | किसी राजा ,सामंत ,दलाल ,साहूकार या
धन्नासेठ का  नरमदिल   पसीजेगा तब इसका   स्वप्न साकार होगा |इनको पालतू
मिटठू ही  भाते हैं |


Sunday, July 15, 2012

बापू हमारे थे ही क्या ?


अब तो बात एकदम साफ हो गयी है |सरकार ने महात्मा गाँधी को कभी औपचारिक रूप से राष्ट्रपिता की उपाधि नहीं दी थी |इस देश के लोग उन्हें यूं ही राष्ट्रपिता कह कर पुकारते आये थे जैसे किसी मोहल्ले के दबंग को दादा भईया काका आदि कहने लगते हैं |अब तक हम बापू का असम्मान, आलोचना और उपेक्षा होने पर भावुक हो जाते थे |पर अब इस सरकारी स्वीकोरिक्ति ने बता दिया है कि वह कोई राष्ट्रपिता –विता नहीं हमारी आपकी तरह एक साधारण आदमी थे और एक आम आदमी का कैसा मान और  क्या सम्मान |आम आदमी तो होता ही है सरकारी तंत्र के लिए सकल  ताड़न का अधिकारी |
इस खुलासे ने देश भर के घर  माताओं पिताओं  के लिए अजब असमंजस की स्थिति पैदा कर दी है |उन्हें लगने लगा है कि उनकी संतति कभी भी यह सवाल खड़ा करके उनकी जान सांसत में डाल सकती है कि आपको किस नियम अधिनियम के तहत माता पिता कहलवाने का अधिकार कब और किसने दिया था ?यदि माता पिता कहलवाने का शौक है तो जाओ, पहले किसी मान्यता प्राप्त आईएसओ प्रमाणित लैब का अपने  डीएनए की जाँच का  प्रमाणपत्र लाओ |
महात्मा गाँधी के लिए अब मामला बड़ा ज़टिल हो गया है |उनके पास अपने पक्ष में कहने के लिए न तो कोई तर्क है ,न वैज्ञानिक साक्ष्य और न ही शारीरिक उपस्थिति |उनके पास केवल देशवासियों से मिलने वाला आदरसूचक संबोधन था ,वह भी तिरोहित हुआ |ले –दे कर दो अन्य आदरणीय विशेषण बचे हैं –बापू और महात्मा |ये विशेषण भी विवादास्पद  हैं |उनको महात्मा कहे जाने से धर्मनिरपेक्ष और तथाकथित धार्मिक पहले से ही असहज रहते आये हैं |धार्मिक उन्हें महात्मा कहलाये जाने के लिए जन्मना अहर्ताओं के अभाव में टेक्निकली अयोग्य मानते हैं और धर्मनिरपेक्षों को किसी भी प्रकार की धार्मिक शब्दावली बर्दाश्त नहीं |उनको हमेशा गाँधी जी के साथ जुड़े इस महात्मा शब्द से ही नहीं  वरन उनके द्वारा गायी जाने वाली रामधुन पर भी  घोर आपत्ति रही है |
बापू के संबोधन में भी कठिनाई है क्योंकि वह अपने पीछे आदर्श ,सदाचरण, देशप्रेम और विचारों का चाहे जो जखीरा छोड़ गए हों पर भौतिक सम्पदा के रूप में अरबों खरबों की प्रापर्टी या  कोई स्विस कोडवर्ड तो किसी को  नहीं देकर गए कि लोग  उन्हें बापू बापू कहते  फिरें  |धनवान बापुओं के लाखों वारिस खुदबखुद पैदा हो जाते हैं और निर्धन  पिताओं को तो पिता कहने में भी बेटों की जुबान दुखती  है |जब तक उनके राष्ट्रपिता होने की भ्रान्ति मौजूद थी तब तक बात कुछ और  थी |लेकिन अब वह किसके  बापू ?
राष्ट्रपिता ,महात्मा और बापू का विशेषण छिन जाने के बाद वह महज मोहनदास करमचंद गाँधी रह गए हैं |अब वह एक ऐसे  आमआदमी हैं ,जिसको मरे खपे अरसा हुआ |यह मुल्क आमआदमी के जब जिंदा होने का संज्ञान ही नहीं लेता ,वह  दशकों पहले स्वर्ग सिधारे व्यक्ति की भला क्या सुध लेगा ?उनका नाम अब न तो जनमानस को झकझोरता  है , न आदर जगाता है ,न किसी वोट बैंक के लिए डुगडुगी बनता  है और न ही हमारी स्मृति को समर्द्ध करता है |मोहनदास कर्मचंद गाँधी  का नाम लगभग छ दशक पूर्व  मृत्यु रजिस्टर में लिखा गया था ,उसकी अब अधिकारिक पुष्टि हो गयी है. 



Monday, June 11, 2012

रौलबैक से बेहतर हैं टिशु पेपर



सरकार ने पेट्रोल की कीमतें बढाई तो बेचारे दो पहिया वाहन वालों की पैबंद लगी जेबें और दिल भक्क से जल उठे |डीजल से चलने वाली लक्जरी गाड़ी में चलने वाले नवधनाढ्यों  को मौका मिला तो वे इनकी बेचारगी पर खिलखिला कर हंस दिए |ये तबका स्वभावतः बड़ा  हंसोड़ होता है |वे  हर मुद्दे  को अपनी राल में लिपटी हंसी से  किसी कनकौए की तरह हवा में उड़ा देते हैं |दो पहिया वाहन वाले सदैव इनके निशाने पर होते हैं |पेट्रोल के दाम तो बढते  रहते हैं और इनको हँसने के लिए मुद्दों की कभी कमी नहीं पड़ती |पिछले कई सालों से  यह सिलसिला जारी है |

दो पहियाधारी आमतौर से  निम्न मध्यवर्गीय शहरी होते हैं |इनके चेहरे पर टिकी  घड़ी सदैव बारह ही बजाती हैं |इन्हें हंसना आता ही नहीं, बस चिढ़ना  आता है |इनकी  मौसम से तो पुरानी लांगडांट है |इनका मानना है कि गर्मी में  सूरज केवल इनपर अंगारे बरसाता है |बादल जानइबूझ कर तभी बरसते हैं, जब ये बेहतरीन पोषाक पहन कर निकलते हैं |ठंडी हवाएं केवल इनके  धैर्य को चुनौती देती हैं |पुलिस केवल इनसे ही ट्रेफिक  कानूनों का पालन करवाना चाहती है |इनके साथ  पक्षपात होता है |सरकार  बस इनसे ही अदावत रखती हैं कि केवल पेट्रोल के दाम बढाती  है |सरकार का यह बयान उन्हें बहुत चुभता है कि ये गरीब मुल्क पेट्रोल पर सबसिडी का भार नहीं सह सकता |वे ये समझने में असमर्थ हैं कि जो मुल्क डीजल  सब्सिडी से लेकर मंत्रियों संतरियों की फ़िज़ूलखर्ची  और अरबों खरबों रुपयों के घोटालों का भार सहर्ष  उठा सकता है ,वह पेट्रोल के मामले में इतना पूर्वाग्रही क्यों है  |

 दोपहिया वाहन वाले तो हंसना कब का भूल चुके  हैं |वे  सुबह सवेरे किसी लाफ्टर क्लब में इसलिए जाते  हैं कि  कभी दैवयोग से हँसने का मौका आया  तो वे  तब तक  कहीं हँसने ही न भूल जाये |वैसे सरकार भी इनकी  सुध कभीकभार ले लेती है |वो पेट्रोल के दाम  मुक्तहस्त से   बढाती है फिर उसे थोड़ा-सा घटा देती   है | रोलबैक के ये बासी गोलगप्पे अब किसी का दिल जीतने के लिए नाकाफी साबित  होते हैं |पर सरकार भी क्या करे ,उसके नीतिनिर्धारकों और अर्थशास्त्रियों को इसके सिवा कोई व्यंजन बनना और परोसना  आता नहीं | इससे बेहतर तो यह होगा कि सरकार पेट्रोल से वाहन चलाने वालों को कुछ टिशु पेपर दे दे, जिससे वे  अपने आंसू पोछ सकें |आंसू बहाना इनकी नियति है और आंसू पोंछना संवेदनशील सरकार का गुरुतर दायित्व |वैसे भी टिशु पेपर बड़े काम का होता है, इससे केवल आँख के आंसूओं को ही नहीं पोंछा जाता  |इन  पर दिल की भड़ास निकलने के लिए शोकगीत लिखे जा सकते हैं |

सबको पता था कि सरकार  रोलबैक करेगी | जनता के हितों के प्रति जागरूकता दिखाने का मौका वह कैसे चूकती | इसके ज़रिये उसने  मानवीय  चेहरा अवश्य उजागर  कर दिया   |यह अलग बात है कि  दोपहियावाहन वालों को वह रिझा न सकी  |वे  सरकार से कुछ इस कदर  चिढे  हैं कि इन्हें रोलबैक हो या रॉक -एन -रौल कुछ  नहीं सुहाता  |फिलहाल तो इन्हें अपनी खाख हो चुकी जेब को दुरुस्त करवाने के लिए एक अदद निपुण रफूगर की शिद्दत से तलाश है |