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Friday, July 29, 2011

प्रार्थनाओं के जवाब आते हैं

यह केवल सुनी -सुनाई बात नहीं है कि प्रार्थनाओं का जवाब देर या सवेर ज़रूर आता है.यह बात सरकारी महकमों पर भले ही खरी न उतरती हो पर ईश्वरीय निजाम में इसकी सत्यता असंदिग्ध है.कावण यात्रा में बरस दर बरस बढ़ती भक्तों की संख्या तो इसी बात की निशानदेही करती है कि लोगों के पास हजारों हज़ार प्रार्थनाएँ हैं और मन के भीतर एक गहरा यकीन कि उनकी भी कभी तो सुनवाई होगी.धर्म की बुनियाद पर जब आस्था का प्रकटीकरण होता है तब विज्ञान पोषित तर्क निरर्थक हो जाते हैं और प्रार्थनाएँ मुखरित हो कर सड़कों पर आपार जन समूह के रूप में सामान्य जनजीवन को स्थगित कर देती हैं.धर्म ,आस्था और एडवेंचर का अजब -गज़ब घालमेल ही तो है यह हरिद्वार से गंगा का पवित्र जल लाकर शिवालयों पर अर्पित करने का सालाना जलसा.हर की पैडी से औघड़नाथ तक की यह चार लाख बाईस हज़ार क़दमों की यात्रा तय करता भक्त सारी कठनाईयों को बिसरा कर केवल अपनी साध के प्रति एकाग्रचित्त हो जाता है.
कावंण यात्रा के चलते हरिद्वार से दिल्ली की ओर जाता राष्ट्रीय राजमार्ग पूरी तरह भगवा रंग में रंग गया था.हर ओर बम -बम भोले की जयकार थी.स्थान -स्थान पर भक्तों की सुविधा के लिए शिविर थे.जहाँ चिकित्सीय सुविधाओं के साथ -साथ भोजन -नाश्ते की निशुल्क व्यवस्था थी.सेवादारों की समर्पण भावना बेमिसाल थी.भक्ति के चरमोत्कर्ष पर कभी -कभी मानवीय सरोकार भी नेपथ्य में चले जाया करते हैं.इस सवाल को कौन उठाए कि इस यात्रा के चलते कितने औद्योगिक उत्पादन की क्षति हुई .कितने दैनिक वेतनभोगी रोज़गार से वंचित हुए ?कितने दैनिक यात्री अपने कार्यस्थलों पर या तो समय से नहीं पहुंचे या पहुँच सकने में असमर्थ रहने के कारण अपने बॉस या मालिक के कोपभाजन बने.इसी वजह से कितने लोगों को अपने रोज़गार से हाथ धोना पड़ा ?हरिद्वार में उमड़े आपार जनसमूह के कारण गंगा और कितनी मैली हुई ?
मेरे एक वामपंथी सोच वाले मित्र ने कभी मुझसे कहा था कि यदि हिंदुओं ने गंगा को एक पवित्र नदी के रूप में अंगीकार करके उसका इस्तेमाल अपने धार्मिक अनुष्ठानों में न किया होता तो यह सारी मानव जाति पर उनकी असीम कृपा होती.अपनी पवित्र धरोहरों के प्रति हमारी यह उदासीनता अनेक असवुविधाजनक सवालों को खड़ा करती है?हर की पैडी पर हर संध्या होने वाली गंगाजी की आरती के बीच क्या हम केवल अपनी महत्वाकांक्षाओं के शार्टकट ही ढूँढा करते हैं या गंगा की पवित्रता और अक्षुण्णता बनाए रखने पर भी कभी कोई विमर्श करते हैं?
कावण के माध्यम से हरिद्वार से गंगा जल लाकर शिवरात्रि के दिन उसे भोले भंडारी को अर्पित करके लगभग डेढ़ करोड़ भक्तों के आवेदन श्रीचरणों तक पहुँच गए हैं.पर इस यात्रा के चलते समुचित इलाज़ से वंचित रह गए,काम पर न पहुँच पाने के कारण रोज़गार से वंचित हुए और दिहाड़ी मजदूरों की प्रार्थनाओं की सुनवाई भी तो इसी दरबार में होनी है.
प्रार्थनाओं के जवाब जब भेजे जायेंगे तो इन गरीब मजलूमों की भी सुनवाई ज़रूर होगी .ईश्वर का न्याय करने अपना तरीका है.वह कभी पक्षपात नहीं करता.उसका निर्णय आये इससे पूर्व क्या भक्तो को आत्ममंथन नहीं करना चाहिए ?

2 comments:

Vijai Mathur said...

कांवर यात्राएं मूर्खता की पराकाष्ठा हैं,धार्मिक नहीं हैं । धर्म को न समझने की ज़लालत हैं । ऐसे मूरखों को अगला जन्म सर्प-योनि मे मिलने वाला है । जो लोग हाथ-पाँव का दुरुपयोग करते हैं या लेट-लेट कर चलते हैं उन्हे हाथ-पाँव न देकर सर्प-योनि मे धकेल दिया जाता है ।
'प्रार्थनाओं'का वैज्ञानिक प्रयोग या महत्व देखने की इच्छा हो तो मेरे'जन हित मे'ब्लग पर देखें । परंतु कृपया मूर्खतापूर्ण गतिविधियों को धार्मिक या प्रार्थना न मानें ।

निर्मल गुप्त said...

आदरणीय माथुर साहब -अगले जन्म में ये सर्प बनें या कनखजूरा,पर इस जीवन में इनके आतंक से बचने का रास्ता क्या हो .कावण यात्रा का यह सालाना जलसा राष्ट्रीय राजमार्ग ५८ पर पड़ने वाले शहरों ,कस्बों ,गावों में रहने वाले बाशिंदों पर कैसी -कैसी मुसीबतें पैदा करता है .
मैं आपका ब्लॉग ज़रूर देखूंगा .