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Friday, September 2, 2011

यह प्रार्थना का समय नहीं है

यह प्रार्थना का समय नहीं है
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दो दिन पहले मेरे शहर में जो कुछ हुआ उसने उन सभी के दिल पर चिंताओं की रेखाओं को गहरा दिया है जो इस झूठी आस में जिंदा थे कि अब यहाँ की फिजाओं में अमन -चैन सदा -सर्वदा कायम रहेगा.दुर्घटना में एक मासूम की मौत के बाद शहर में जिस प्रकार उपद्रव ,आगजनी और हिंसा हुई उसने शहर के सीने पर कुछ ऐसे स्याह सवाल अंकित कर दिए हैं जिनका जवाब यदि समय रहते नहीं तलाशा गया तो इसकी पुनरावृत्ति झेलने के लिए यह शहर अभिशप्त होगा.वो कौमें जो अपने इतिहास से कोई सबक हांसिल नहीं करती वे अतीत की उन रक्तरंजित गुफाओं में जीने के लिए विवश होती हैं जहाँ मानवीय सरोकार अर्थहीन हो हाशिए पर रहते हैं और जंगल के नृशंस कानून का आधिपत्य रहता है.इस बात पर यकीन करने को जी नहीं चाहता कि हमने अपने कलंकित इतिहास से कुछ नहीं सीखा ,पर हाल की कुछ घटनाएँ तो हमारे आशावाद के खिलाफ खडी दिखाई देती हैं.यह हताशा की पराकाष्ठा का समय है .हम एक ऐसे खेदजनक समय के साक्षी बन रहे हैं ,जिसमें विवेक और तर्क किसी निठल्ले का शगल बन कर रह गई है.
एक मासूम की अकाल मौत निश्चित ही हृदयविदारक होती है.इसे देखने सुनने के बाद हर दिल रोता है.ईश्वरीय निजाम पर कोई प्रश्न चिन्ह लगाये बिना उससे यह पूछने का मन तो करता ही है कि परवरदिगार इस मासूम ने क्या खता की थी कि उसे ऐसी सजा मिली.अपने प्रिय को खो देने का गम बहुत रुलाता है.बाप के कांधे पर अपने बच्चे का शव दुनिया का सबसे बड़ा बोझ होता है.दुर्घटना से हुई मौत जहाँ स्तब्ध कर देती है वहीँ उद्वेलित भी करती है.ग़मगीन होते हुए भी शिराओं में क्रोध की चिंगारियां भी उठा करती हैं.पर यह अपने गम की कैसी अभिव्यक्ति है जो सरकारी बसों को क्षतिग्रस्त ,निर्दोष यात्रियों को (जिनमें बच्चे और महिलाएं शामिल हैं )चोटिल कर दे ,उन खोखों को आग के हवाले कर दे जो सभवतः किसी के लिए दो जून रोटी का एकमात्र जुगाड़ हो.मानना होगा कि ऐसी प्रतिक्रिया कभी किसी ग़मगीन धार्मिक की नहीं हो सकती.दूसरे के दुःख में सहभागिता के नाम पर अपने स्वार्थ की रोटियां सेकने वालों की कमी नहीं हैं.उनके लिए तो गम और उत्तेजना का संयोग खुल कर खेलने का अवसर होता है ,जिसका वे भरपूर लाभ उठाते हैं.ऐसे अराजक तत्वों की शिनाख्त ज़रूरी है पर धर्म और मज़हब की कोई सीमा रेखा बिना खींचे.यह धारणा तमाम झंझावात के मध्य भी निर्विवाद है कि उपद्रवियों का कोई मज़हब नहीं होता.किसी भी धर्म या मज़हब का मूल मंतव्य ही सदभावना होता है.
पुलिस और प्रशासन के हस्तक्षेप के बाद जब स्थिति सामान्य हुई तो अनेक ऐसी आवाज़ सुनाई दीं कि दोषियों को बख्शा न जाये ,उनके खिलाफ सख्त कार्यवाही ज़रूरी है. कानून अपना काम अवश्य करे,कोई भी इससे इंकार नहीं कर सकता.और यकीनन बलवाइयों की धरपकड भी होगी.पर क्या इसके बाद सब कुछ सामान्य हो जायेगा?फिर कभी उपद्रवी ऐसा कुछ करने में कामयाब नहीं होंगे?वे कौन लोग हैं जिनके इशारे पर क्रोध से निकली छोटी -सी चिंगारी दावानल में बदल जाती है ,क्या इनकी सही शिनाख्त और धरपकड ज़रूरी नहीं ?
अब मेरा शहर किसी झूठे आशावाद में और नहीं रहना चाहता कि अब यहाँ का हवा और पानी साम्प्रदायिकता के प्रदूषण से पूर्णत: मुक्त हो चुका है और सदभाव और विकास की बयार बहने लगी है.मुझे यहाँ के हवा और पानी से शिकायत है कि उसका प्रसार और वितरण इतना पक्षपात पूर्ण क्यों है ,जिसके चलते एक तबके को इक्कीसवीं शताब्दी की समस्त सुविधायें उपलब्ध हैं और एक तबका ऐसा है जो मध्ययुगीन मानसिकता के बीच जिंदा है.
कहने वाले अब कह रहे हैं कि भगवान का शुक्र है कि कोई बड़ा हादसा होने से बच गया.परवरदिगार ने न जाने कितनी जानें बचा लीं .आप मानें या न मानें आपकी कोई भी दिलासा,शाब्दिक ढांढस या सहायता राशि उस माँ को राहत पहुँचाने के लिए नाकाफी है ,जिसके कलेजे का टुकड़ा देखते ही देखते मौत के आगोश में चला गया.यह प्रार्थना की मुद्रा में आँखे मूँद कर खड़े होने का समय नहीं है .मुझे तो यही मालूम है कि ईश्वर केवल उनकी मदद करता है जो साम्प्रदायिक सौहाद्र की उसकी दिखाई राह पर चलते हैं .किसी बलवाई ,आत्मघाती या परायी पीर के चूल्हे पर हाथ सेकने वाले के साथ वह कभी खड़ा नहीं होता .कम से कम मेरी धर्म सम्बन्धी जानकारी तो यही है . यह समय सजग चिंतन और आत्ममंथन का है .
निर्मल गुप्त


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