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Wednesday, September 21, 2011

टोपी में सदभावना

टोपी भर सदभावना
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एक समय की बात है .एक राजा को सदभावना एकत्र करने की आवश्यकता अनुभव हुई .उसने मुनादी करा दी कि प्रजा आये और यथाशक्ति सदभावना उसे दे .सारे राज्य में सदभावना न्योछावर करने के उत्सुक लोगों में होड़ लग गई .लोग झोला भर भर कर सदभावना लेकर आने लगे .राजा एक मंच पर आसीन थे .लोग आते अपनी शाब्दिक सदभावना के गीत गाते और राजा के चरणों में शीश नवाते और आगे बढ़ जाते .कुछ लोग ऐसे भी थे जो अपनी सदभावना को बड़ी एहतियात सेएक से बढ़ कर अलंकृत टोपियों में संभाल कर लाए थे .वे भी मंच पर गए राजा को टोपी पहनाई और अपनी सदभावना से राजा की बेशकीमती पोषाक ,उसका तन और मन सबको सराबोर कर दिया.
राजा टोपियां पहनता रहा ,आनंदित होता रहा .अंत में एक गरीब जुलाहे की जब बारी आयी तो उसने झिझकते हुए अपने हाथों से बड़े प्यार से बुनी टोपी को राजा के सिर पर पहनाने की अनुमति मांगी .राजा ने उसकी एकदम साधारण टोपी को देखा तो उसे पहनने से इंकार कर दिया.
राजा ने कहा -ए जुलाहे मैं तेरी ये टोपी नहीं पहन सकता .तूने तो इसे लाने में बड़ा विलम्ब कर दिया.
जुलाहे ने राजा से कातर स्वर में फिर अनुनय की -महराज मेरी टोपी को अपने सिर पर सजने का मौका दें .
राजा जुलाहे की उस बाल हठ पर हंस पड़ा ,बोला -अरे मूर्ख ,सबने इतनी सदभावना मुझ पर उड़ेली है कि केवल मैं ही नहीं ,मेरा मुकुट ,मेरा सिंहासन सब तरबतर हैं ..अब तेरी टोपी वाली सदभावना तो मेरी आत्मा को ही भिगो देगी ,जिसे मैंने अब तक बड़े जतन से भीगने से बचा रखा है .
-ए जुलाहे ,तू ही बता अपनी भीगी हुई आत्मा को लेकर मैं कैसे करूँगा राज .मुझे तो अभी चक्रवर्ती सम्राट भी बनना है.जा ले जा अपनी टोपी अपने साथ.
राजा की ये बात सुनकर जब जुलाहा मंच से नीचे आया तो उसकी उस टोपी में रखी सदभावना से गर्म भाप उड़ रही थी .

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