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Saturday, October 15, 2011

जलपुरुषजी से नम्र निवेदन

जल पुरुष के नाम से विख्यात और पानी बचाओ कार्यकर्ता राजेन्द्र सिंह ने कहा कि सरकार नहीं चाहती कि नदियाँ बचे |मैग्सेसे पुरस्कारधारी एक शलाका पुरुष के मुख से ऐसा बेचारगी से परिपूर्ण बयान,चौंकाने वाला है |यदि वह चाहते हैं कि नदियों का जल प्रदूषित न हो और उनके साथ -साथ देश की जनता भी यही चाहती है, तब अड़चन क्या है ?बात सिर्फ इतनी सी है कि यदि हम अपनी नदियों को प्रदूषित करना बंद कर दें तो कोई भी सरकार चाहे, वह कितनी भी धार्मिक या धर्मनिरपेक्ष क्यों न हो ,उसकी पवित्रता के साथ कैसे खिलवाड़ कर सकती है ?इस सवाल का जवाब मेरे शहर के किसी तार्किक और उदभट विद्वान के पास नहीं है |सभी का कहना है कि यदि जलपुरुष नदियों में बढते प्रदूषण से चिंतित हैं तो उसकी कोई गंभीर वजह ज़रूर होगी| पर वह उसकी वजह और उसका निदान ढूँढ पाने में खुद को असमर्थ पा रहे हैं |वैसे भी मेरे शहर के तमाम पर्यावरणविद अपने -अपने जेबी(इसे मोबाईल भी कह सकते हैं ) संगठनों की कनेक्टीविटी(इसे जोड़ तोड़ कह सकते हैं ) को लेकर इतने सक्रिय रहते हैं कि उनके पास ऐसे स्थानीय महत्व के मसलों पर अपना सिर खपाने के लिए न तो अवकाश है,न आवश्यकता और न इच्छाशक्ति|उनकी अन्तराष्ट्रीय सोच के एजेंडा में साइबेरिया के सारसों की घटती प्रजनन क्षमता ,आस्ट्रेलिया की कोकोबुरा चिड़िया का टूटा हुआ डेना , उत्तरी ध्रुव पर मियादी बुखार से पीड़ित सफ़ेद भालू, अफ्रीका के किसी जंगल का उदास शतुरमुर्ग होते हैं |वे अपनी सोच का दायरा ग्लोबल कर चुके हैं |
जल पुरुषजी से मेरा नम्र निवेदन है कि वे सरकारी चाहत को लेकर कतई दुखी न हों |सरकार के पास कर -गुजरने के लिए बहुत से बड़े -बड़े काम हैं |मसलन उन्हें किसी बच्चे की तरह बात -बात पर रूठते -मचलते अपने मंत्रियों को निरंतर बहलाने फुसलाते रहने का काम करना होता है |रात दिन उजागर होते घोटालों के सम्बन्ध में सारगर्भित बयान तैयार करना होता है |भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ बुलंद करने वालों की अक्ल दुरुस्त करने के लिए यहाँ -वहाँ छापेमारी करवानी होती है |काले धनपशुओं के नामों की गोपनीयता बनाए रखने लिए सत्ता के गलियारों में लगे अनगनित अदृश्य कानों से जूझना पड़ता है |इस सरकार को प्रत्येक निर्णय के लिए लोकतान्त्रिक व्यवस्था के भव्यतम दरबार में हाजिरी और उसकी स्वर्णिम मोहर लगवानी पड़ती है |सरकार के पास जल और जलपुरुष की चिंताओं से प्रभावित होने के लिए समय ही कहाँ है ?
जल पुरुषजी ,मुझे नहीं पाता कि आपको त्रिया चरित्र के विषय में कितनी व्यापक और क्या जानकारी है |हमारी सरकार का चाल,चरित्र और चेहरा भी महान रीतिकालीन बिहारी की उस नायिका जैसा ही है जो बतरस के लालच में कन्हैया की मुरली चुरा लेती है |पूछने पर सौगंध पूर्वक कहती है कि मुरली उसके पास नहीं है , यह कहते हुए अपनी भंगिमा में फिस्स से हंस कर हाँ भी कह देती है | कन्हैया मुरली लौटने को कहते हैं तो वह अपनी बात से साफ मुकर जाती है |यही तो सरकार भी करती है ,जो कहती है वो करती नहीं ,जो करती है वो किसी को बताना नहीं चाहती|हालंकि आर टी आई (सूचना का अधिकार ) ने उसकी जान मुसीबत में कर दी है |रीतिकाल में ये सुविधा रही होती तो नायिका अपने मंसूबों में कैसे कामयाब होती |
कृपया सरकार की ओर किसी उम्मीद से निहारना बंद करें और यह परख लें कि हमारी नीयत वास्तव में पाक साफ़ है | तब तो नदियों का बहता जल खुद -ब -खुद साफ़ होने लगेगा |गंगा सरीखी दिव्य नदी की पवित्रता को बनाए रखने लिए धार्मिक अनुष्ठान या किसी सरकारी दान ,भत्ते या रहमोकरम की नहीं, हमारे सद्कर्मों की आवश्यकता है |नदियों को प्रदूषित करने के लिए हमारे स्वार्थ ही एकमात्र उत्तरदायी है |जल पुरुषजी ,इस सरकार को मेहरबानी करके उसके हाल पर छोड़ दें |

निर्मल गुप्त

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