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Tuesday, February 7, 2012

एक़ समय की बात

एक समय की बात है 
एक महानगर में रहती थी 
एक लड़की 
जो हँसती हरदम खिलखिला कर ऐसे 
जैसे बहे कोई उच्श्रंखल नदी 
अपने तटबंधों से बेपरवाह 
समय सीमाओं को चिढ़ाती. 

मुस्कान थिरकती उसके होठों पर 
पूरे दिन 
तब जब वह काम में रहती तल्लीन 
या फिर तलाश रही होती 
एक बार फिर बेरोजगार होकर 
अपने लिए कोई दूसरा काम ए
उसे खूब पता है हंसना कितना ज़रूरी है 
उसके लिए 
वह जब तक हँसती रहेगी यूं ही 
तब तक जिंदा रहेगी .

उदासी को उसने टांग रखा है अपने कमरे की खूँटी पर 
जिस पर कभी टंगा करती थी 
उसके स्वर्गीय पिता की झूठी आस और वह गिटार 
जिसे लेकर आये थे वह 
सपनों के इस रूपहले संसार में 
इस यकीन के साथ 
कि इसकी स्वर लहरी 
और उनकी जादूभरी आवाज़ 
लोगों के दिल में उतर जायेगी 
और ऐशोआराम खुदबखुद चले आयेंगे 
उनके पास .

पिता का आशावाद तो जिंदा रहा 
लेकिन वह खुद चले गए 
नक्षत्रों के पार 
यह कहते –कहते कि
बिटिया उदास न हो 
आज नहीं तो कल 
कल नहीं तो ....
कभी न कभी 
हमारे भी दिन फिरेंगे.

और फिर दिन फिरे कुछ इस तरह 
कि उसे जल्द पता लग गया 
रोज़गार के बाज़ार में 
एकाकी लड़की की उदासी 
और अभागे पिता के गिटार की 
जुगलबंदी 
एक समय का भरपेट 
खाना देने तक को नाकाफी हैं .

एक समय की बात है 
उस लड़की ने बात- बेबात पर 
हंसना सीखा 
घनीभूत निराशा को 
मुस्करा कर वाष्पित करने की
कला को जाना 
अब वह हँसती है बेसाख्ता 
और पिता की अदृश्य अंगुलियां 
थिरकने लगती हैं 
गिटार के तारों पर .

लाडली बेटी हँसे 
और पिता का गिटार रहे खामोश 
ऐसा हो भी कैसे सकता है 
यह उस समय की बात है .

2 comments:

Patali-The-Village said...

बहुत सुन्दर खुबसूरत रचना। धन्यवाद।

Pallavi said...

बहुत सुंदर भाव संयोजन से सुसजित गहन अभिव्यक्ति ॥