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Friday, February 17, 2012

अल्बर्ट पिंटो को इतना गुस्सा क्यों आ रहा है ! ! !




                                  मेरे शहर के युवा आजकल गुस्से में हैं |दिलचस्प बात यह है कि इनके इस गुस्से के पीछे कोई परोक्ष या प्रत्यक्ष वजह नहीं है, फिर भी वो गुस्से में हैं |बहुत दिनों के बाद इन युवाओं को इतना गुस्सा आया है तो कहा ये जा रहा है कि लोकतंत्र के बगीचे में कोई दुर्लभ फूल खिलने वाला है |हालाँकि यह तो आने वाला समय ही बताएगा कि कौन सा  गुल खिलता  है |गुलगुले खाकर गुड़ से परहेज़ करने वाला ये तबका वेलेंटाइन डे की खुमारी से मुक्त होकर और  अपनी कमीजों की आस्तीनों से चाकलेट –डे पर खायी गई चाकलेटों से सने  होठों  को पोंछने के बाद उसे चढ़ाये  इस चुनावी महाकुम्भ में  वोट के जरिये अपने गुस्से के इज़हार के लिए कमर कसे है |पर उनकी यह बेताबी कितनी सार्थक होगी ,इसे देखना फ़िलहाल कौतुहल का विषय  है |अब तक का  अनभूत सच तो यही रहा है कि एंग्री यंगमैन की छवि रुपहले परदे पर चाहे जितनी रोमांचक लगती हो  ,यथार्थ की खुरदरी जमीन पर गुस्सा केवल हाहाकारी परिणाम लेकर ही सामने आता है |इस बार राजनीतिक पटल पर इतनी बड़ी संख्या में तथाकथित एंग्री यंगमैन अपने जलवे दिखा रहे हैं कि सबको  एक दूसरे से पूछना पड़ रहा  है  कि आखिर अल्बर्ट पिंटो को इतना गुस्सा क्यों आ रहा है |ये चुनाव आयोग से नाराज़ हैं; या वोटरों की चुप्पी से या आम जनता से या फिर अपनी बेबसी से बोखलाए हैं |बहरहाल सत्तर के दशक के एंग्री यंगमैन के इन नवीनतम अवतारों ने युवा दिलों को कुछ ऐसे आन्दोलित किया है कि हर युवा के लिए अपनी कमीज़ या कुरते की आस्तीन चढ़ाना ज़रूरी हो गया है |ऐसा न करने की स्थिति में  लोग नाहक ही  उनकी जवानी पर सवालिया निशान लगा सकते हैं |नेतागिरी में अपने केरियर तलाश रहे लोगों के लिए हालात बड़े नाज़ुक हैं |वे पशोपेश में हैं कि क्या करें |आस्तीन चढ़ाने पर उनकी ठूंठ जैसी बाहें जुल्फों को स्याह करके बनाये गए जवानी के भरम को नेस्तनाबूद कर सकती हैं और यदि उन्होंने  ऐसा नहीं किया और आलाकमान ने  इसे अनुशासनहीनता मान  लिया तब ..... तब तो उनके पालिटिकल  केरियर से जुड़े सारे ख्वाब ही बिखर जायेंगे |
                               यह बात भी सभी को पता है कि आदमी जब उम्रदराज़ होकर बुजुर्ग की पदवी पा लेता है और खुद को सीनियर सिटीजन कहलवा कर गौरान्वित महसूस करने लगता है ,तब उसके पास युवा पीढ़ी को बाँटने के लिए मुफ्त की हिदायतों का भरपूर भंडार होता है |मेरे शहर के ये सीनियर सिटीजन आपको यहाँ –वहाँ ये  कहते मिल जायेंगे कि गुस्सा किसी समस्या का समाधान नहीं होता |इसके जवाब में अपनी आस्तीनों को चढ़ाये युवा ये कहते दिखाई दे रहे हैं कि होता तो गिडगिडाने से भी कुछ नहीं |इन खडूस बूढों को बतियाने के सिवा आता ही क्या है |ऐसा संभवतः पहली बार हुआ है जब मेरे शहर में हमेशा खिंची रहने साम्प्रदायिकता की  रेखा धूमिल हुई है और उसके स्थान पर कमउम्र ,हमउम्र और उम्रदराजों की सोच का मामला बहस के केन्द्र में है |ये अलग बात है कि मतदान के दिन हर उम्र के युवा ,अधेड़ ,वृद्ध पुनः अपने –अपने मजहब ,जाति और संप्रदाय के अनुरूप एकजुट होकर कतारबद्ध दिखाई देंगे |मतदान का प्रतिशत बढ़ेगा तो  इसे बढ़ाने की मुहिम में लगे सभी संस्थाएं और संगठन अपनी पीठ थपथपाएंगे |काश युवा आस्तीनों से निकला गुस्सा  चुनावी न होकर स्थाई होता तब उससे कोई सार्थक परिणाम सामने आ पाते |
                           इस समय सारी दुनिया एक छोटे  नेपकिन  में बदल गई है और हम लोग अपने मुगालतों के साथ यथार्थ और इंटरनेटजनित आभासी दुनिया में एक साथ जिंदा रहने की कला सीख रहे हैं |चुनाव जिताने की गारंटी प्रदाता इवेंट मैनेजर इस बार युवाओं के गुस्से को आकर्षक रैपर में लपेट कर बाज़ार में आये हैं |इसी का परिणाम है कि गली –गली शहर शहर गुस्से में नथुने फुलाए लोग किसी क्रन्तिकारी बदलाव का सपना देख रहे हैं |यकीनन इवेंट मैनेजमेंट के प्रबंधन गुरु अपनी इस प्रारम्भिक कामयाबी पर खुश तो बहुत होंगे लेकिन इन्हें नहीं पता कि सपने जब टूटते हैं तो उसकी किरचें केवल आँखों में ही नहीं खटका करतीं वरन आत्मा तक को लहूलुहान कर देती है |
                       मैं आपको याद दिला दूं कि मेरा नाम, उपनाम या छद्मनाम अल्बर्ट पिंटो नहीं है मैं खुद को युवा मानने की किसी गलतफहमी का शिकार भी नहीं हूँ |इस तथ्य के बावजूद गुस्सा मुझे भी आता है |अपने शहर की बदहाली पर दिल मेरा भी रोता है |विकास के वादों के जरिये ठगे जाने पर नाराज़ मैं भी बहुत होता हैं |चारों ओर व्याप्त भ्रष्टाचार को देखकर  मेरे नथुने भी गुस्से से बहुत फड़फड़ाया करते  हैं |पर मेरे इस गुस्से से किसी का कुछ बनने या बिगड़ने वाला नहीं है |इससे मेरा रक्तचाप और खून में शुगर लेविल ज़रूर बढ़ जाया करता है |मेरा  सभी के लिए  यह नम्र मशविरा है कि अपने –अपने गुस्से से बाहर आयें और अत्यंत ठन्डे दिमाग से ये सोचें कि वे धर्म जाति संप्रदाय और निहित स्वार्थ से ऊपर उठ कर क्या कुछ सार्थक कर सकते हैं |
                  बात-बात पर गुस्सा होने वाले अल्बर्ट पिंटो के इन नवीनतम अवतारों को  उनकी आरामदायक कब्र में चैन की नींद सोने दें |
                             
      
                    

3 comments:

Arun Sandhu said...

बहुत ही अच्छा लिखा है आपने बिलकुल युवाओं की भाषा में ! पढ़कर अच्छा लगा...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत बढ़िया प्रस्तुति
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आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल सोमवार के चर्चा मंच पर भी लगा रहा हूँ! सूचनार्थ!
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महाशिवरात्रि की मंगलकामनाएँ स्वीकार करें।

G.N.SHAW said...

गुप्त जी समसामयिक लेख ! सुन्दर ! शिवरात्रि की शुभकामनाएं !