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Thursday, March 15, 2012

नाक हो तो ऐसी




                                                                  हाल ही में संपन्न हुए प्रदेश विधानसभा चुनावों में अनेक लोगों की नाक दांव पर लगी थी |हर ओर एक ही खतरा था कि कहीं नाक न कट जाये और परिणाम आये तो आंकड़े बताते हैं कि कटी नाक वालों को निर्विविवाद रूप से बहुमत मिला |जीतने वाले कम रहे  और हारने वाले अधिक |इस हिसाब से  प्रदेश ने उत्तम प्रदेश बनने की बाधा दौड़ में नकटा प्रदेश बनने का ख़िताब अपने नाम कर लिया |अधिकांश राजनीतिक रणनीतिकार ,चुनावी पंडित ,पार्टियों के स्टार प्रचारक और वोट बैंक हार गए |बन्दर  रोटी के बंटवारे की लड़ाई लड़ते रहे  और चतुर, चालाक  ,चपल बिलौटा   उनकी रोटी ले भागा   | फिर हुआ यह कि सबकी नाकें अपने स्थानों पर बदस्तूर कायम रही  |केवल इतना ही नहीं उन पर बाकायदा सत्तासीन दल के लाल झंडे बड़ी शान से लहराते दिखाई दिए |हरे ,नीले, भगवा बहुरंगी  झंडे सबने तह लगाकर ससम्मान अपने –अपने संदूकों में रख दिए |राजनीति में कुछ भी कभी निष्प्रयोज्य नहीं होता ,बस उनकी उपयोगिता कुछ समय के लिए स्थगित हो जाती है |इसी तरह मतवाद की नाकें कट कर भी नहीं कटा करती |वे यदि कट भी जाती हैं  तो तुरंत ही और अधिक पैनी होकर फिर उग आती हैं |और एक बार उन पर सत्तारूढ़ दल का ध्वजारोहण हुआ नहीं कि उसकी आनबान शान देखने लायक हो जाती है |सत्ता का प्राश्रय नाकों को न केवल निरापद बना देता है वरन उसको कुछ ऐसे महिमामंडित भी कर देता है कि उसपर बैठने की हिमाकत कोई नामाकूल निठल्ली  मक्खी तो कम से कम नहीं कर सकती |
                                                             मेरे शहर में एक कक्का जी रहते हैं |उनके कारनामे और उनकी  कहिन बड़े  दिलचस्प होते  हैं  |उनके श्रीमुख से उच्चारित प्रत्येक शब्द अनेकार्थी होता है |लोग बताते हैं वे दादा कोंडके के मानस पुत्र हैं |उनकी नाक भी इन चुनावों में कटने की पुष्ट सूचना मिली थी |ऐसा पहली बार नहीं हुआ |हर चुनाव में उनकी नाक ऐसे ही कटती आई है पर यह भी एक सर्वमान्य तथ्य है कि वह अपनी नाक कटने के गम को सत्ता के रंग में इतनी द्रुतगति से रंग देते हैं कि उनकी नाक कटने की परिघटना ईर्ष्यालुओं द्वारा फैलाई गई अफवाह बन कर रह जाती है |फिर जब वह किसी कद्दावर नेता के बगलगीर दिखाई देने लगते हैं तो उनकी नाक कटने का प्रकरण खुदबखुद नेपथ्य में चला जाता है |फिर होता यह है कि कक्काजी की  पतलून  की जेब सोने और चांदी के सिक्कों से भरने  लगती है और लोगों के उलझे हुए काम बनने शुरू हो जाते हैं |तब वह पहली फुरसत में अपनी कटी हुई पुरानी नाक का चुपचाप गोमती में प्रवाह कर देते हैं और अपने नए बने गाडफादर से मिलती जुलती नाक अपने चेहरे पर जड़वा लेते हैं | उनका तो यही कहना है कि नाक वही सच्ची , जो मेरे आका को लगे अच्छी |वो नाक बेकार जो कट कर दुखे बार –बार |
               कक्काजी मेरे शहर के किवदंती पुरुष हैं |उनके कारनामों के अनेक  किस्से प्रचलित हैं|लेकिन किसी को यह नहीं पता कि इनमे से कितने सच्चे हैं और कितने मनघडंत |वह इन किस्सों को बड़े चाव से सुनते हैं और न कभी किसी बात का खंडन करते हैं और न कभी पुष्टि |उनका मानना है कि सुनाम हो या बदनाम ,नाम का सिक्का चलना चाहिए |और सिक्का  तभी तक चलता है जब तक वह खनकता है |उनकी यह कहिन चाहे पूरी सच न भी हो तो भी सच के आसपास तो है ही |आजकल बाज़ार का सर्वमान्य सिद्धांत भी यही है कि जो बिकता है वही चलता है और जो चलता है वही बिकता भी है |यकीनन कक्काजी का सिक्का सत्ता की मंडी में खूब चलता है |सरकारें आती  हैं ,सरकारें चली जाती हैं ,पर कक्का जी की नाक अपने मिशन में लगी रहती है |अड़ी रहती है |अडिग रहती है |इससे क्या फर्क पड़ता है कि वह कितनी खरी या कितनी खोटी |
             मेरा सभी कटी नाक वालों से नम्र निवेदन है कि वे अपने चेहरों को रूमाल से ढँक कर यहाँ –वहाँ मुहँ छुपाते न फिरें और इस सच को स्वीकार करें कि बदले परिदृश्य  में  मुहावरों के  मतलब बदल रहे हैं  |हाथी वही कारगर होता है जो सरेबाजार घूमता सबको दिख सके |ढका हाथी तो खाक  हो जाता है  |यही कक्काजी की कहिन है |वह खुद साइकिल चलाना तक नहीं जानते पर अनेक ऐसे  साइकिल  सवारों से उनकी गहरी छनती है ,जिनके कैरियर पर वह खुद को देर या सवेर टिका ही लेंगे |


             

            


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