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Wednesday, May 9, 2012

एक गुमनाम इतिहासकार


एक ऐसे इतिहासकार को भुला दिया जाना वास्तव में दुखद है ,जिसने मेरठ के भूले बिसरे स्वतंत्रता सेनानियों को यथोचित गौरव दिलवाने का महत्वपूर्ण कार्य  किया .क्या मेरा शहर इतना कृतघ्न 

कभी-कभी वाकई अफसोस होता है। दुख भी होता है। यह जानकर कि महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के बाद भी कोई शख्सियत गुमनामी के अंधेरे में है। उसे उतनी प्रसिद्धि भी नहीं मिली, जितने का वह हकदार है। डॉ. देवेंद्र ऐसे ही व्यक्ति हैं, जिन्होंने किया तो बहुत कुछ, लेकिन समाज की नजर से वे आज भी ओझल ही हैं। हैरान करने वाली बात यह भी है कि जिन मेरठ की ऐतिहासिक संदर्भों को लेकर गाहे-बे-बेगाहे आयोजन के जरिए हम इतराते हैं, उसमें इनके योगदान को याद करने से भी लगभग रह जाते हैं। दरअसल, हम सिर्फ उपलब्धियों को देखने भर के आदी होते जा रहे हैं। इसके पीछे किसने बेशकीमती योगदान दिया, यह जानने की कोशिश भी नहीं के बराबर करते हैं। यही सब कारण हैं कि आज इनके जैसे इतिहासकार गुमनामी की स्थिति में हैं, जहां अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान दिया।

देवेंद्र सिंह का जन्म गाजियाबाद जनपद के सपनावत गांव में सीसौदिया राजपूत परिवार में 1940 में हुआ। इनके परिवार ने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया। इनकी शिक्षा अलीगढ़, खुर्जा तथा मेरठ में हुई। इनके पिता इन्हें इंजीनियर बनाना चाहते थे, लेकिन इनकी इच्छा अध्ययन की थी। इन्हें इस बात का अफसोस रहा कि स्वतंत्रता आंदोलन में अपने अल्प आयु होने के कारण भागीदारी नहीं कर सके। हालांकि, स्वतंत्रता आंदोलन पर लेखन कर अपने दायित्व को पूरी इमानदारी के साथ निभाया।
इन्होंने सर्वप्रथम मेरठ के अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त ‘मेरठ कॉन्सपरेसी केस’ पर पीएचडी की उपाधि ली। भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद नई दिल्ली की संस्तुति और वित्तीय अनुदान से इसे पुस्तक आकार दिया गया। इस पुस्तक की व्यापक स्तर पर समीक्षाएं प्रकाशित हुर्इं। डॉ. सिंह की विशेषता यह रही कि जहां भी रहे, इन्होंने उस स्थान के सुनहरे इतिहास को टटोलने की कोशिश की। अपने गांव सपनावत पर इनका लेख ‘हापुड़ की रसीद और सपनावत का चातुर्य’ ऐसा है, जो वहां के बुजुर्ग बाबा तुहीराम के कारण 1957 की क्रांति के समापन के पश्चात अपने गांव सहित अन्य पड़ोसी कई गांवों को अंग्रेजी प्रतिशोध के कहर से बचाया। इनका अधिकांश समय मेरठ में बीता। 1857 पर इन्होंने अनेक लेख लिखे।
10 मई 1857 को मेरठ में तैनात कोतवाल धन्ना सिंह पर लेख लिखकर इन्होंने गुर्जरों में जागृति का संचार किया। अखिल भारतीय गुर्जर महासभा ने धन्ना सिंह का नाम धनसिंह कोतवाल कर दिया। आज मेरठ में धन सिंह कोतवाल के नाम पर मूर्ति, सड़क, चौराहे तथा कई स्कूलों के नामकरण हैं। कई वर्ष तक गुर्जर सभा इन्हें सम्मानित भी करती रही। मेरठ अपनी साम्प्रदायिक छवि के कारण भी चर्चा में रहा है। डॉ. सिंह ने दिल्ली से प्रकाशित ‘कम्यूनल राइट्स इन इंडिया’ में मेरठ एंड कम्यूनल राइट्स लेख देकर अपना अध्याय जोड़ा है।
स्वतंत्रता आंदोलन में विशेष रुचि के कारण डॉ. सिंह के स्वतंत्रता सेनानियों से प्रगाढ़ संबंध रहे। उसी दिशा में इन्होंने उनके सहयोग से मेरठ जनपद के स्वतंत्रता सेनानियों की सचित्र स्मारिका का संपादन किया। इस स्मारिका के लिए मेरठ स्वतंत्रता सेनानियों की व्यापक छानबीन की। उसी छानबीन की बदौलत अनेक पेंशन से वंचित सेनानियों को पेंशन मिली।
देवेंद्र सिंह सीडीए(आर्मी) तत्कालीन सेंट्रल कमांड में सेवारत रहे। विभाग की स्थापना के 250 वर्ष तथा स्वतंत्रता की 50वीं वर्षगांठ के अवसर पर कंट्रोलर जनरल आॅफ डिफेंस एकाउंट्स नई दिल्ली ने विभाग की ऐतिहासिक महत्व की वस्तुएं एवं दस्तावेजों की खोज और संकलन के लिए, इनकी सेवाएं प्राप्त की और समापन के पश्चात इनकी निष्ठा और लगन के लिए धन्यवाद दिया। सीडीए(आर्मी) के मुख्य भवन(वैलवेडियर कॉम्लेक्स) तथा इसके इतिहास पर जो लाइट एंड साउंड प्रोग्राम बना, उसकी स्क्रिप्ट डॉ. देवेंद्र ने ही लिखी।
मेरठ में 10 मई को 1857 से ही शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता था। इन्होंने इस दिवस को शहीद दिवस के स्थान पर क्रांति दिवस मनाए जाने का आह्वान किया। याद दिलाया कि देश को आजाद कराने में जिन लोगों ने शहादत पाई, उन सबके लिए 30 जनवरी(महात्मा गांधी की शहादत) नियत है। इसलिए दो शहीद दिवस मनाने का कोई तुक नहीं। इस प्रकार इनके सुझाव से 10 मई को क्रांति दिवस मनाना शुरू हुआ।
डॉ. सिंह एक स्वतंत्र विचारक तथा लेखक हैं। इनके लगभग तीन दर्जन शोधपत्र भारत की प्रतिष्ठित शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। दर्जनों शोधार्थियों ने इनके मार्गदर्शन से अपना शोध कार्य पूरा किया, जिसका श्रेय इन्हें कभी नहीं मिला, क्योंकि औपचारिक रूप से देवेंद्र किसी कॉलेज में अध्यापक नहीं थे। इसके अतिरिक्त देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्र एवं पत्रिकाओं में इनके लेख तथा व्यंग की संख्या लगभग 300 है। गुमनामी में जीवन बसर कर रहे 70 वर्षीय डॉ. देवेंद्र सिंह आज भी लिखने, पढ़ने और मार्गदर्शन में अपना पूरा समय बिता रहे हैं।
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2 comments:

रविकर फैजाबादी said...

हर दिन जैसा है सजा, सजा-मजा भरपूर |
प्रस्तुत चर्चा-मंच बस, एक क्लिक भर दूर ||

शुक्रवारीय चर्चा-मंच
charchamanch.blogspot.in

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

डॉ. देवेंद्र सिंह की जानकारी के लिये धन्यवाद!